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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 579 of 711

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Page 579
५५६श्रीरामकृष्णवचनामृत३० जून, १८८४

होता है, उस पर एक और आकार लगाना वृथा है। 'का' का 'का' ही रहेगा। (सब हँसते हैं।)

"नित्यसिद्ध की एक अलग ही श्रेणी है, जैसे 'अरणि' काठ, जरासा रगड़ने से ही आग पैदा हो जाती है, और न रगड़ने से भी होती है। नित्यसिद्ध थोड़ीसी साधना करने पर ही ईश्वर को पा जाता है और साधना न करने पर भी पाता है।

"हाँ, नित्यसिद्ध ईश्वर को पा लेने पर साधना करते हैं। जैसे कुम्हड़े का पौधा, पहले उसमें फल लगता है, तब ऊपर फूल होता है।"

कुम्हड़े के पौधे में फल पहले होते हैं, फिर फूल, यह सुनकर पण्डितजी हँस रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – और नित्यसिद्ध होमा पक्षी की तरह हैं। उसकी माँ आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती है। अण्डे देने पर गिरते हुए अण्डे फूट जाते हैं और फिर बच्चे भी गिरते रहते हैं। गिरते गिरते ही उनके पर निकल आते और आँखें खुल जाती हैं; परन्तु जमीन पर गिरकर कहीं चोट न लग जाय, इस ख्याल से वे फिर सीधे ऊँचे की ओर अपनी माँ के पास उड़ने लगते हैं। माँ कहाँ है, बस यही धुन रहती है। देखो न, 'क' लिखते हुए प्रह्लाद की आँखों से अश्रुधारा बह चली थी।

पण्डितजी का विनयभाव देखकर श्रीरामकृष्ण बड़े सन्तुष्ट हुए हैं। वे पण्डितजी के स्वभाव के सम्बन्ध में भक्तों से कह रहे हैं –

"इनका स्वभाव बड़ा अच्छा है। मिट्टी की दीवार में कीला गाड़ते हुए कोई तकलीफ नहीं होती। पत्थर में कील की नोंक चाहे टूट जाय पर पत्थर का कुछ नहीं होता। ऐसे भी आदमी हैं, जो लाख ईश्वर की चर्चा सुनें, पर उन्हें चेतना किसी तरह नहीं होती। जैसे घड़ियाल, देह पर तलवार भी चोट नहीं कर सकती।"

पण्डितजी – घड़ियाल के पेट में बरछी मारने से मतलब सिद्ध हो जाता है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – सब शास्त्रों के पाठ से क्या होगा – फिलॉसफी (Philosophy) पढ़कर क्या होगा? लम्बी लम्बी बातों से क्या होता है? धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करनी हो तो पहले केले के पेड़ पर निशाना साधना चाहिए, फिर नरईत के पौधे पर, फिर जलती हुई दीपक की बत्ती पर – फिर उड़ती हुई चिड़िया पर।

"इसीलिए पहले साकार में मन स्थिर करना चाहिए।

"और त्रिगुणातीत भक्त भी हैं – नित्यभक्त जैसे नारदादि। उस भक्ति में श्याम भी चिन्मय है, धाम भी चिन्मय है, और भक्त भी चिन्मय है। ईश्वर, उनका धाम तथा भक्त, सभी नित्य हैं।

"जो लोग 'नेति-नेति' के द्वारा ज्ञानपूर्वक विचार कर रहे हैं, वे अवतार नहीं मानते।