श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| ३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५५३ |
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पूर्ण हो और मैं अंश हूँ; कभी सोचता हूँ, तुम सेव्य हो और मैं सेवक हूँ; और राम! जब तत्त्वज्ञान होता है तब देखता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो, मैं ही ‘तुम’ हूँ।'
“कृष्ण के विरह से विकल होकर यशोदा राधिका के पास गयी। उनका कष्ट देखकर राधिका उनसे अपने स्वरूप में मिली और कहा, ‘श्रीकृष्ण चिदात्मा हैं और मैं चित्शक्ति। माँ, तुम मेरे पास वर माँगो।’ यशोदा ने कहा, ‘माँ! मुझे ब्रह्मज्ञान नहीं चाहिए, बस यही वरदान दो कि गोपाल के रूप के सदा दर्शन होते रहें, कृष्ण-भक्तों का सदा संग मिलता रहे। भक्तों की मैं सेवा करूँ और उनके नाम-गुणों का कीर्तन करूँ।’
“गोपियों की इच्छा हुई थी कि भगवान के ईश्वरी रूप का दर्शन करें। कृष्ण ने उन्हें यमुना में डुबकी लगाने के लिए कहा। डुबकी लगाते ही सब वैकुण्ठ जा पहुँचीं। वहाँ भगवान के उस षडैश्वर्यपूर्ण रूप के दर्शन तो हुए, परन्तु वह उन्हें अच्छा न लगा। तब कृष्ण से उन लोगों ने कहा, ‘हमारे लिए गोपाल के दर्शन, गोपाल की सेवा, बस यही रहे; हम और कुछ नहीं चाहतीं।’
“मथुरा जाने से पहले कृष्ण ने उन्हें ब्रह्मज्ञान देने का प्रयत्न किया था। कहला भेजा था, ‘मैं सर्व भूतों के अन्तर में भी हूँ और बाहर भी। तुम लोग क्या एक ही रूप में देख रही हो?’ गोपियों ने कहा, ‘कृष्ण हम लोगों को छोड़ जायेंगे, इसलिए ब्रह्मज्ञान का उपदेश भेजा है?’
“जानते हो गोपियों का भाव कैसा है? ‘हम राधा की – राधा हमारी।’”
एक भक्त – यह भक्त का ‘मैं’ क्या कभी नहीं जाता?
श्रीरामकृष्ण – वह ‘मैं’ कभी कभी चला जाता है। तब ब्रह्मज्ञान होता है, समाधि होती है। मेरा भी चला जाता है, परन्तु सब समय नहीं। सा, रे, ग, म, प, ध, नि; परन्तु ‘नि’ में अधिक देर तक नहीं रहा जाता। फिर नीचे के पदों में उतर आना पड़ता है। मैं कहता हूँ, माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान न देना। पहले-पहल साकारवादी खूब आते थे। इसके बाद आजकल के निराकारवादी ब्राह्म समाजियों का धावा होने लगा। तब प्रायः उसी तरह मैं बेहोश होकर समाधिमग्न हो जाया करता था। और होश में आने पर कहता था, माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान न देना।
पण्डितजी – हमारे कहने से क्या वे सुनेंगे?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर कल्पतरु हैं। भक्त जो कुछ चाहेगा, वही पायेगा। परन्तु कल्पतरु के पास पहुँचकर माँगना पड़ता है, तब कामना पूरी होती है।
“परन्तु एक बात है। वे भावग्राही हैं। जो जो कुछ सोचता है, साधना करने पर वह वैसा ही पाता है। जैसा भाव होता है, वैसा ही लाभ भी होता है, कोई बाजीगर राजा के सामने तमाशा दिखा रहा था। कहता था, ‘महाराज, रुपया दीजो – कपड़े दीजो’ यही सब। इसी समय उसकी जीभ ऊपर तालु में चढ़ गयी। साथ ही कुंभक हो गया। बस जबान
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