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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 558 of 711

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Page 558

२५ जून, १८८४ परिच्छेद ८४ ५३५

का कुछ नहीं हो सकता। तलवार की चोट से घड़ियाल का क्या बिगड़ सकता है? साधु का कमण्डल चारों धाम हो जाता है, पर ज्यों का त्यों कड़ुआ बना रहता है। तुम्हारे लेक्चर से विषयी आदमियों का विशेष कुछ होता नहीं, यह बात तुम खुद धीरे धीरे समझ जाओगे। बछड़ा एक साथ ही खड़ा नहीं हो जाता। कभी-कभी गिर जाता है और फिर उठने की कोशिश करता है। तब खड़ा होना और चलना भी सीखता है।

"कौन भक्त है और कौन विषयी, यह बात तुम समझते नहीं, यह तुम्हारा दोष भी नहीं है। पहले जब आँधी आती है, तब कोई यह नहीं पहचान पाता, कौन आम है और कौन इमली।

"ईश्वर-लाभ जब तक नहीं होता, तब तक कोई कर्मों को बिलकुल छोड़ नहीं सकता। सन्ध्या-वन्दनादि कर्म कितने दिनों के लिए हैं? – जब तक ईश्वर के नाम पर अश्रु और पुलक न हो। 'हे राम' ऐसा एक बार कहते ही अगर आँखों में आँसू आ जायें, देह पुलकित होने लगे, तो निश्चय समझना कि उसके कर्मों का अन्त हो गया। फिर उसे सन्ध्यादि कर्म न करने पड़ेंगे।

"फल के होने पर ही फूल गिर जाता है; भक्ति फल हैं, कर्म फूल। गृहस्थ की बहू के लड़का होनेवाला हुआ, तो वह अधिक काम नहीं कर सकती। उसकी सास दिनोंदिन उसका काम घटाती जाती है। दसवें महीने के आने पर फिर उसे बिलकुल काम नहीं छूने देती। लड़का होने पर फिर वह उसी को लेकर रहती है, दूसरे काम नहीं करने पड़ते। सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है, गायत्री प्रणव में, प्रणव समाधि में। जैसे घण्टे का शब्द – टं-ट-अ-म्। योगी नाद-भेद करके परब्रह्म में लीन होते हैं। समाधि में सन्ध्यादि कर्मों का लय हो जाता है। इसी तरह ज्ञानियों के कर्म छूट जाते हैं।"

(३)

केवल पाण्डित्य व्यर्थ है। साधना तथा विवेक-वैराग्य

समाधि की बात कहते ही कहते श्रीरामकृष्ण का भाव बदलने लगा। उनके श्रीमुख से स्वर्गीय ज्योति निकलने लगी। देखते देखते बाह्य-ज्ञान जाता रहा, शब्दरहित हो गये, आँखें स्थिर हो गयीं। वे इस समय परमात्मा के दर्शन कर रहे हैं। बड़ी देर बाद प्राकृत अवस्था आयी। बालक की तरह कह रहे हैं, मैं पानी पीऊँगा। समाधि के बाद जब पानी पीना चाहते थे, तब भक्तों को मालूम हो जाता था कि अब ये क्रमशः बाह्य भूमि पर आ रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण भावावेश में कहने लगे, 'माँ, उस दिन ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को तूने दिखलाया। इसके बाद मैंने फिर कहा था, माँ, मैं एक दूसरे पण्डित को देखूँगा, इसीलिए मुझे यहाँ लायी।'