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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 557 of 711

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Page 557

५३४ श्री रामकृष्णवचनामृत २५ जून, १८८४

(२)

कलि में भक्तियोग

दोपहर चार बजे के करीब, श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़े। बड़े ही कोमलांग हैं, बड़ी सावधानी से देह की रक्षा होती है। इसीलिए रास्ता चलते तकलीफ होती है। गाड़ी न होने पर थोड़ी दूर भी चलते हैं, तो बड़ा कष्ट होता है। गाड़ी पर चढ़कर भावसमाधि में मग्न हो गये। उस समय नन्ही-नन्ही बूँदों की वर्षा हो रही थी। आकाश में बादल छाये हैं, रास्ते में कीचड़ है। भक्तगण गाड़ी के पीछे-पीछे पैदल चल रहे हैं। उन्होंने देखा, रथयात्रा का स्वागत लड़के ताड़ के पत्ते की बाँसुरी बजाकर कर रहे थे।

गाड़ी मकान के सामने पहुँची। द्वार पर घर के मालिक और उनके आत्मीयों ने आकर स्वागत किया।

ऊपर जाने की सीढ़ी के बगल में बैठकखाना है। ऊपर पहुँचकर श्रीरामकृष्ण ने देखा, शशधर उनकी अभ्यर्थना के लिए आ रहे हैं। पण्डितजी को देखकर मालूम हुआ कि वे यौवन पार कर चुके हैं, प्रौढ़ावस्था को प्राप्त हैं। रंग साफ गोरा है – गले में रुद्राक्ष की माला पड़ी है। उन्होंने बड़े विनय-भाव से श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। फिर साथ ही उन्हें घर ले गये।

श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए लोग उनकी बातचीत सुनने के लिए बड़े उत्सुक हो रहे हैं। नरेन्द्र, राखाल, राम, मास्टर और दूसरे भी बहुत से भक्त उपस्थित हैं। हाजरा भी श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर-कालीमन्दिर से आये हुए हैं।

पण्डितजी के देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण को भावावेश होने लगा। कुछ देर बाद उसी अवस्था में हँसते हुए पण्डितजी की ओर देखकर कह रहे हैं – ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!’ फिर उनसे कहा, ‘तुम कैसे लेक्चर देते हो?’

शशधर – महाराज, मैं शास्त्रों के उपदेश समझाने की चेष्टा करता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए नारदीय भक्ति है। शास्त्रों में जिन सब कर्मों की बात है, उनके साधन के लिए अब समय कहाँ है? आजकल के बुखार में दशमूल पाचन की व्यवस्था ठीक नहीं। दशमूल पाचन देने से इधर रोग ऐंठ जाता है। आजकल बस ‘फीवर-मिक्सचर’! कर्म करने के लिए अगर कहते हो, तो केवल सार की बात कह दिया करो। मैं आदमियों से कहता हूँ, तुम्हें ‘आपोधन्यन्या’ इतना यह सब न कहना होगा। गायत्री के जप से ही तुम्हारी बन जायगी। अगर कर्म की बात कहनी ही हो, तो ईशान की तरह के दो-एक कर्मियों से कह सकते हो।

“लाख लेक्चर दो, परन्तु विषयी मनुष्यों का कुछ कर न सकोगे। पत्थर की दीवार में क्या कभी कीला गाड़ सकते हो? कीला खुद चाहे टूट जाय – मुड़ जाय, पर पत्थर