श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद ८४
कलि में भक्तियोग
(१)
श्रीरामकृष्ण और शशधर पण्डित
आज रथयात्रा है; बुधवार, २५ जून १८८४ आषाढ़ की शुक्ला द्वितीया। आज सुबह श्रीरामकृष्ण ईशान के घर निमन्त्रित होकर आये हैं। ईशान का घर ठनठनिया में है। यहाँ पहुँचकर श्रीरामकृष्ण ने सुना, शशधर पण्डितजी पास ही कालेज स्ट्रीट में चटर्जियों के यहाँ हैं। पण्डितजी को देखने की उनकी बड़ी इच्छा है। पिछले पहर पण्डितजी के यहाँ जाना निश्चित हुआ। दिन के दस बजे का समय होगा।
श्रीरामकृष्ण ईशान के नीचेवाले बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हैं। ईशान के मुलाकाती भाटपाड़ा के दो-एक ब्राह्मण थे जिनमें एक भागवत के पण्डित भी थे। श्रीरामकृष्ण के साथ हाजरा तथा और भी दो-एक भक्त आये हैं। श्रीश आदि ईशान के लड़के भी हैं। एक भक्त और आये हैं, ये शक्ति के उपासक हैं। मत्थे पर सिन्दूर का बुन्दा लगाये हैं। श्रीरामकृष्ण आनन्द में हैं। सिन्दूर का बुन्दा देखकर हँसते हुए कहा, इन पर तो मार्क लगा हुआ है!
कुछ देर बाद नरेन्द्र और मास्टर अपने अपने मकान से आये। दोनों ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उनके पास ही आसन ग्रहण किया। श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा था, अमुक दिन मैं ईशान के घर जाऊँगा, तुम वहीं नरेन्द्र को साथ लेकर मिलना।
श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा, उस दिन मैं तुम्हारे यहाँ जा रहा था, तुम कहाँ रहते हो?
मास्टर – जी, अब श्यामपुकुर तेलीपाड़ा में स्कूल के पास रहता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – आज स्कूल नहीं गये?
मास्टर – जी, आज रथ की छुट्टी है।
नरेन्द्र के पितृवियोग के बाद से घर में बड़ी तकलीफ है। वे ही अपने पिता के सब से बड़े लड़के हैं। उनके छोटे छोटे कई भाई और बहिनें हैं। पिता वकील थे, परन्तु कुछ छोड़कर नहीं जा सके। परिवार के भोजन-वस्त्र के लिए नरेन्द्र नौकरी तलाश रहे हैं।