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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 553 of 711

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Page 553

५३० श्रीरामकृष्णवचनामृत २० जून, १८८४

“कालीबाड़ी के पहलेवाले खजांची से जब कोई कुछ ज्यादा चाहता था, तब वह कहता था, दो तीन दिन बाद आना, मालिक से पूछ लूँ।

“कलि के अन्त में कल्कि-अवतार होगा। वे ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लेंगे। एकाएक उनके एक घोड़ा और तलवार आ जायेगी ...।”

अधर आरती देखकर आये; आसन ग्रहण किया। भुवनमोहिनी नाम की धाई कभी-कभी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए आया करती है। श्रीरामकृष्ण सब की चीजें नहीं ग्रहण कर सकते - विशेषकर डाक्टरों, कविराजों और धाइयों की नहीं ले सकते। घोर कष्ट देखकर भी वे लोग रुपया लेते हैं, इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनकी चीजें नहीं ले सकते।

श्रीरामकृष्ण - (अधर से) - भुवनमोहिनी आयी थी। पच्चीस बम्बई आम और सन्देश-रसगुल्ले लायी थी। मुझसे कहा, एक आम आप भी लीजिये। मैंने कहा, नहीं पेट भरा हुआ है। और सचमुच, देखो न, जरा सा सन्देश और कचौड़ी खायी, इतने ही से पेट कैसा हो गया।

“केशव सेन की माँ बहिन आदि सब आयी थीं। इसलिए उनका दिल बहलाने के लिए मुझे कुछ नाचना पड़ा था। और मैं क्या करूँ, उन्हें कितनी गहरी चोट पहुँची है!”

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