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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 541 of 711

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Page 541
५१८श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ जून, १८८४

दो बजे के बाद प्रताप आये। ये एक ब्राह्मभक्त हैं। आकर श्रीरामकृष्ण को नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण ने भी सिर झुकाकर नमस्कार किया। प्रताप के साथ बहुतसी बातें हो रही हैं।

प्रताप – मैं दार्जिलिंग गया था।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु तुम्हारा शरीर उतना सुधर नहीं पाया। जान पड़ता है, कोई बीमारी हो गयी है।

प्रताप – जी, केशव को जो बीमारी थी, वही मुझे भी है। उन्हें भी यही बीमारी थी।

केशव की दूसरी बातें होने लगीं। प्रताप कहने लगे, केशव का वैराग्य उनके बचपन से ही जाहिर हो रहा था। उन्हें खेलते-कूदते हुए लोगों ने बहुत कम देखा है। हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे। उसी समय सत्येन्द्र के साथ उनकी बड़ी मित्रता हो गयी और उसी कारण श्रीयुत देवेन्द्रनाथ ठाकुर से उनकी मुलाकात हुई। केशव में दोनों बातें थीं, योग भी और भक्ति भी। कभी कभी उनमें भक्ति का इतना उद्रेक होता था कि वे मूर्छित हो जाते थे। गृहस्थों में धर्म लाना उनके जीवन का प्रधान उद्देश्य था।

महाराष्ट्र देश की एक स्त्री के सम्बन्ध में बातचीत होने लगी।

प्रताप – हमारे देश की कुछ महिलाएँ विलायत गयी थीं। महाराष्ट्र देश की एक महिला विलायत गयी थीं। वे खूब पण्डिता हैं; परन्तु ईसाई हो गयी हैं। आपने क्या उनका नाम सुना है?

श्रीरामकृष्ण – नहीं, परन्तु तुम्हारे मुख से जैसा सुन रहा हूँ, इससे जान पड़ता है, उसे प्रसिद्धि तथा सम्मान-प्राप्ति की इच्छा है। इस तरह का अहंकार अच्छा नहीं। 'मैंने किया' यह अज्ञान से होता है। 'हे ईश्वर तुम्हीं ने ऐसा किया', यही ज्ञान है। ईश्वर ही कर्ता हैं, और सब अकर्ता।

“मैं-मैं करने से कितनी दुर्गति होती है, इसका ज्ञान बछड़े की अवस्था सोचने पर हो जाता है। बछड़ा 'हम्मा हम्मा' (मैं, मैं) किया करता है। उसकी दुर्गति देखो। बड़ा होने पर उसे सुबह से शाम तक हल जोतना पड़ता है – चाहे धूप हो, चाहे वृष्टि। कभी कसाई के हाथ गया कि उसने उसकी बिलकुल ही सफाई कर दी। मांस लोगों के पेट में चला गया और चमड़े के जूते बने। आदमी उन पर पैर रखकर चलता है। इतने पर भी दुर्गति की इति नहीं होती। चमड़े से जंगी ढोल मढ़े गये और लकड़ी से लगातार वह पीटा जाने लगा। अन्त में अँतड़ियों को लेकर ताँत बनायी गयी। जब धुनिये के धनुए में वह लगा दी जाती है और वह रूई धुनता है तब वह 'तू-ऊं – तूं-ऊं' कहने लगता है। तब 'हम्मा-हम्मा' नहीं कहता। जब 'तूं-ऊं-तूं-ऊं' कहता है, तब कहीं निस्तार पाता है। तब मुक्ति होती है। कर्म-क्षेत्र में फिर नहीं आना पड़ता।

“जीव भी जब कहता है, 'हे ईश्वर, मैं कर्ता नहीं हूँ, कर्ता तुम हो – मैं यन्त्र मात्र