श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१७
महिमाचरण काशीपुर में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है और सर्वदा ये दक्षिणेश्वर आया-जाया करते हैं। ब्राह्मण के लड़के हैं, कुछ पैतृक सम्पत्ति भी है। स्वाधीन रहते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। सारे समय शास्त्राध्ययन और ईश्वरचिन्तन किया करते हैं। कुछ पाण्डित्य भी है, अंग्रेजी और संस्कृत के बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन किया है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, महिमाचरण से) – यह क्या! यहाँ तो जहाज आ गया! (सब हँसते हैं।) इन सब स्थानों में तो डोंगे ही आ सकते हैं, यह तो एकदम जहाज आ गया। (सब हँसे।) परन्तु एक बात है। यह आषाढ़ का महीना है। (सब हँसते हैं।)
महिमाचरण के साथ कितनी ही तरह की बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अच्छा, बताओं, लोगों को खिलाना एक तरह से उन्हीं की सेवा नहीं है? – सब जीवों के भीतर वे अग्नि के रूप से विराजमान हैं। खिलाना अर्थात् उनमें आहुति देना।
"परन्तु इसलिए बुरे आदमी को न खिलाना चाहिए – ऐसे आदमी जिन्होंने व्यभिचार आदि महापातक किया हो। घोर विषयासक्त आदमी जहाँ बैठकर भोजन करते हैं, वहाँ सात हाथ तक की मिट्टी अपवित्र हो जाती है।
"हृदय ने सिऊड़ में एक बार कुछ आदमियों को भोजन कराया था। उनमें अधिकांश मनुष्य बुरे थे। मैंने कहा, 'देख हृदय, उन्हें अगर तू खिलायेगा तो मैं तेरे घर एक क्षण भी न ठहरूँगा।' (महिमा से) – अच्छा, मैंने सुना है, पहले लोगों को तुम बहुत खिलाते-पिलाते थे। अब शायद खर्च बढ़ गया है!" (सब हँसते हैं।)
(५)
ब्राह्मभक्तों के संग में। अहंकार। दर्शन का लक्षण
अब पत्तल पड़ रहे हैं – दक्षिणवाले बरामदे में। श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं, "तुम एक बार जाओ, देखो वे सब क्या कर रहे हैं। और तुमसे मैं कह नहीं सकता, परन्तु जी में आ जाय तो परोस भी देना।" "सामान ले आया जाय, परोसने की बात तो तब है!" – यह कहकर महिमाचरण लम्बे डग से दालान की ओर चले गये, फिर कुछ देर बाद लौटकर आ गये।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक भोजन कर रहे हैं।
भोजन के पश्चात् घर में आकर विश्राम करने लगे। भक्तगण भी दक्षिणवाले तालाब में हाथ-मुँह धोकर पान खाते हुए फिर श्रीरामकृष्ण के पास आ गये। सब ने आसन ग्रहण किया।