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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 439 of 711

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Page 439

४१६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

भोजन तैयार है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ मकान के भीतर गए और उन्होंने आसन ग्रहण किया। ब्राह्मण का मकान है व्यंजन कई तरह के तैयार कराये गए हैं, ऊपर से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ भी लायी गयी हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा। भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के बैठकखाने में आकर बैठे। पास में श्रीश और मास्टर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण श्रीश के साथ फिर बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा क्या भाव है? सोऽहं या सेव्य-सेवक?

“संसारियों के लिए सेव्य-सेवक का भाव बहुत अच्छा है। सब सांसारिक काम तो कर रहे हैं, ऐसी अवस्था में ‘मैं वही हूँ’ यह भाव कैसे आ सकता है? जो कहता है, ‘मैं वही हूँ’, उसके लिए तो संसार स्वप्नवत् है; उसका अपना शरीर और मन भी स्वप्नवत् है, उसका ‘मैं’ भी स्वप्नवत् है; अतएव संसार का काम वह नहीं कर सकता। इसीलिए सेव्य-सेवक भाव, दास-भाव बहुत अच्छा है।

“दास-भाव हनुमान का था। श्रीराम से हनुमान ने कहा था ‘राम, कभी तो मैं सोचता हूँ, तुम पूर्ण हो – मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो – मैं दास हूँ, और जब तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब देखता हूँ, मैं ही तुम हूँ, और तुम्हीं मैं हो।’

“तत्त्वज्ञान के समय सोऽहम् हो सकता है, परन्तु वह दूर की बात है।”

श्रीश – जी हाँ, दास-भाव से आदमी निश्चिन्त हो सकता है। प्रभु पर सब कुछ निर्भर है। कुत्ता बड़ा स्वामिभक्त है, इसीलिए स्वामी पर सब भार देकर वह निश्चिन्त रहता है।

साकार निराकार – नाममाहात्म्य

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हें साकार ज्यादा पसन्द है या निराकार? बात यह है कि जो निराकार है, वही साकार भी है। भक्त की आँखों को वे साकार रूप से दर्शन देते हैं। जैसे अनन्त जलराशि, महासमुद्र, जिसका न ओर है न छोर; उसी जल में कहीं कहीं बर्फ जम गयी है; ज्यादा ठण्डक पहुँचने पर पानी जमकर बर्फ हो जाता है। उसी तरह भक्ति-हिम द्वारा साकार रूप के दर्शन होते हैं। फिर जिस तरह सूर्योदय होने पर बर्फ गल जाती है – ज्यों का त्यों पानी हो जाता है, उसी तरह ज्ञानमार्ग या विचार-मार्ग से होकर जाने पर साकार रूप के दर्शन नहीं होते, फिर तो सब निराकार ही निराकार दीख पड़ता है। ज्ञान-सूर्योदय होने पर साकार बर्फ गल जाती है।

“परन्तु देखो, जिसकी निराकार सत्ता है, उसी की साकार भी है।”

शाम होने को है। श्रीरामकृष्ण उठे। अब दक्षिणेश्वर को लौटनेवाले हैं। बैठकखाने के दक्षिण ओर जो बरामद़ा है, उसी पर खड़े होकर ईशान से बातचीत कर रहे हैं। वहीं