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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 438 of 711

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Page 438

२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१५

दो, उन्हें आम मुखत्यारी दे दो! वे जो कुछ अच्छा समझें, करें। बड़े आदमी पर अगर भार दे दिया जाय, तो वह कभी बुराई नहीं कर सकता।

“साधना की भी आवश्यकता है। परन्तु साधक दो तरह के होते हैं। एक तरह के साधकों का स्वभाव बन्दर के बच्चे जैसा होता है, दूसरे तरह के साधक का बिल्ली के बच्चे जैसा। बन्दर का बच्चा किसी तरह खुद अपनी माँ को पकड़े रहता है। इसी तरह कोई साधक सोचते हैं, हमें इतना जप करना चाहिए, इतनी देर तक ध्यान करना चाहिए, इतनी तपस्या करनी चाहिए, तब कहीं ईश्वर मिलेंगे। इस तरह के साधक अपने प्रयत्न से ईश्वर-प्राप्ति की आशा रखते हैं।

“परन्तु बिल्ली का बच्चा खुद अपनी माँ को नहीं पकड़ सकता। वह पड़ा हुआ बस ‘मीऊँ मीऊँ’ करके पुकारता है। उसकी माँ चाहे जो करे। उसकी माँ कभी उसे बिस्तर पर ले जाती है, कभी छत पर लकड़ी की आड़ में रख देती है, और कभी उसे मुँह में दबाकर यहाँ-वहाँ रखती फिरती है। वह स्वयं अपनी माँ को पकड़ना नहीं जानता। इसी तरह कोई कोई साधक स्वयं हिसाब करके साधन-भजन नहीं कर सकते कि इतना जप करूँगा, इतना ध्यान करूँगा। वह केवल व्याकुल होकर रो-रोकर उन्हें पुकारता है। उसका रोना सुनकर वे फिर रह नहीं सकते। आकर दर्शन देते हैं।”

(२)

ईश्वर कर्ता हैं, तथापि कर्मों के लिए जीव उत्तरदायी है।

दिन चढ़ आया है। घर के मालिक ने भोजन के लिए घर में कच्ची रसोई का सामान तैयार कराया है। वे बड़े व्यस्त हैं। वे घर के भीतर जाकर भोजन का प्रबन्ध कर रहे हैं।

दिन बहुत हो गया है, इसीलिए श्रीरामकृष्ण भोजन के लिए जल्दी कर रहे हैं। वे उसी कमरे में टहल रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। कभी कभी केशव कीर्तनिया से वार्तालाप कर रहे हैं।

केशव कीर्तनिया – वही करण और वही कारण हैं; दुर्योधन ने कहा था,

‘त्वया हृषीकेश हृदिस्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।’

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, वही सब कराते हैं; यह ठीक है। कर्ता वही हैं, मनुष्य तो यन्त्र-स्वरूप है।

“और यह भी ठीक है कि कर्मफल भी है। मिर्च खाने पर पेट जलता रहेगा। पाप करने से उसका फल अवश्य भोगना होगा।

“जिसे सिद्धि हो गयी है, जिसने ईश्वर को पा लिया है, वह फिर पाप नहीं कर सकता। उसके पैर बेताल नहीं पड़ते। जिसका सधा हुआ गला है, उसके स्वर में सा रे ग म बिगड़ने नहीं पाता।”