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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 366 of 711

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Page 366

परिच्छेद ५९

केशव सेन के मकान पर

(१)

कमल-कुटीर के सामने - पश्यति तव पन्थानम्

कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी, २८ नवम्बर १८८३, दिन बुधवार है। आज एक भक्त* कमल-कुटीर (Lily Cottage) के पूर्ववाले रास्ते पर टहल रहे हैं; जैसे व्याकुल हो किसी की प्रतीक्षा कर रहे हों।

कमल-कुटीर के उत्तर की तरफ मंगलबाड़ी है। वहाँ बहुतसे ब्राह्मभक्त रहते हैं। कमल-कुटीर में केशव रहते हैं। उनकी पीड़ा बढ़ गयी है। कितने ही लोग कहते हैं, अब की बार शायद वे न बचेंगे।

श्रीरामकृष्ण केशव को बहुत प्यार करते हैं, आज इन्हें देखने के लिए आनेवाले हैं। वे दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर से आ रहे हैं। इसीलिए भक्तलोग उनकी बाट जोह रहे हैं।

कमल-कुटीर सर्क्यूलर रोड के पश्चिम ओर है। इसीलिए भक्त महोदय रास्ते में ही टहल रहे हैं। वे दो बजे दिन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। कितने ही लोग जाते हैं, वे उन्हें देख भर लेते हैं।

रास्ते के पूर्व ओर विक्टोरिया कालेज है। यहाँ केशव के समाज की बहुतसी ब्राह्म महिलाएँ ओर उनकी कन्याएँ पढ़ती हैं। रास्ते से कालेज का बहुतसा भाग दिखायी पड़ता है। कालेज के उत्तर की ओर एक बड़ा उद्यानगृह है, उसमें कोई अंग्रेज सज्जन रहते हैं। भक्त महोदय बड़ी देर से देख रहे हैं कि उनके यहाँ कोई विपत्ति आयी है। थोड़ी देर बाद काले कपड़े पहने कोचवान मृतदेह ले जानेवाली गाड़ी ले आए। करीब डेढ़-दो घण्टों से यह सब तैयारी चल रही है।

यह मर्त्यधाम छोड़कर कोई चला गया है इसीलिए यह तैयारी हो रही थी। भक्त सोच रहे हैं – कहाँ? देह को त्यागकर मनुष्य कहाँ जाता है?

उत्तर से दक्षिण की और कितनी ही गाड़ियाँ आ रही हैं। भक्त एक एक बार देख


* ग्रन्थकार स्वयं