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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 340 of 711

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Page 340

२६ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५५ | ३१७

और गालीगलौज!”

मणि – मैंने किशोरी से कहा था, छूछे सन्दूक में है कुछ भी नही, परन्तु आदमी खींचातानी कर रहे हैं, रुपये हैं, यह समझकर।

“अच्छा, यह देह ही तो कुल अनर्थों का कारण है। यही सब देखकर ज्ञानी सोचते हैं, इस गिलाफ को छोड़ें तो जी बचे।”

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर की ओर जा रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्यों? इस संसार को धोखे की टट्टी कहा है तो इसे आनन्द की कुटिया भी तो कहा है! देह रही भी तो क्या? संसार आनन्द की कुटिया भी तो हो सकता है।

मणि – निरवच्छिन्न आनन्द यहाँ कहाँ है?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है।

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने आए। माता को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। मणि ने भी प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने चबूतरे पर बिना किसी आसन के कालीमाता की ओर मुँह किए बैठे हुए हैं। केवल लाल धारीदार धोती पहने हैं। उसका कुछ हिस्सा पीठ पर पड़ा है और कुछ कन्धे पर। पीछे नाटमन्दिर का एक स्तम्भ है। पास ही मणि बैठे हैं।

मणि – यही अगर हुआ तो देहधारण की फिर क्या आवश्यकता है? देख तो यह रहा हूँ कि कुछ कर्मों का भोग करने के लिए ही देह धारण करना होता है। वह क्या कर रहा है वही जाने। बीच में हम लोग पिस रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – चना अगर विष्ठा पर पड़ जाए तो भी उससे चने का ही पौधा निकलता है।

मणि – फिर भी अष्ट-बन्धन तो हैं ही।

सच्चिदानन्दही गुरू उनकी कृपा से ही मुक्ति

श्रीरामकृष्ण – अष्ट बन्धन नहीं, अष्टपाश हैं तो इससे क्या? उनकी कृपा होने पर एक क्षण में अष्टपाश छूट सकते हैं, जिस तरह कि हजार साल के अँधेरे कमरे में दीपक ले जाने पर एक क्षण में अँधेरा दूर हो जाता है, थोड़ा थोड़ा करके नहीं जाता। बाजीगर का एक खेल तुमने देखा है? कितनी ही गाँठ लगी रस्सी का एक छोर वह एक जगह बाँध देता है और दूसरा छोर अपने हाथ से पकड़े रहता है। उसने रस्सी को हिलाया नहीं कि सब ग्रन्थियाँ एक साथ खुल गयीं। परन्तु दूसरा आदमी चाहे लाख उपाय करे, उसे खोल नहीं सकता। श्रीगुरु की कृपा से सब ग्रन्थियाँ एक क्षण में ही खुल जाती हैं।

“अच्छा, केशव सेन इतना बदल कैसे गया? – बताओ तो। परन्तु यहाँ खूब