श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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| ३१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २६ सितम्बर, १८८३ |
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विचार करता था, 'ब्रह्म सत्य हैं, संसार मिथ्या।' माया के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं, इसी विचार से वह रोशनी के झाड़ की कलम लिए फिरता था। झाड़ की कलम से देखो तो कितने ही रंग दीख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में रंग कोई भी नहीं है। उसी तरह ब्रह्म के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं, परन्तु माया और अहंकार के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं। किसी चीज को वह एक बार से अधिक न देखता था, जिससे कहीं माया न लग जाय आसक्ति न हो जाय। नहाते समय पक्षी को उड़ते हुए देखकर वह विचार करता था। हम दोनों एक साथ जंगल जाते थे। उसने जब यह सुना कि तालाब मुसलमानों का है तब उसमें से जल नहीं लिया। हलधारी ने उससे व्याकरण के प्रश्न किए; वह व्याकरण जानता था। व्यंजनवर्णों की बात हुई। तीन दिन यहाँ ठहरा था। एक दिन गंगाजी के किनारे पर शहनाई की आवाज सुनकर उसने कहा, जिसे ब्रह्मदर्शन होता है उसे इस तरह की आवाज सुनकर समाधि हो जाती है।”
(२)
दक्षिणेश्वर में गुरु श्रीरामकृष्ण। परमहंस-अवस्था
श्रीरामकृष्ण साधुओं की बात कहते हुए परमहंस की अवस्था बतलाने लगे। वही बालक की-सी चाल। मुँह पर हँसी जैसे एकदम फूट-फूटकर निकल रही है। कमर में कपड़ा नहीं, दिगम्बर; आँखें आनन्दसागर में तैरती हुई। श्रीरामकृष्ण फिर छोटे तख्त पर जा बैठे, फिर वही मन को मुग्ध कर देनेवाली बातें होने लगीं।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैंने न्यांगटा (तोतापुरी) से वेदान्त सुना था। 'ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या है।' बाजीगर आकर कितने ही तमाशे दिखाता है, आम के पौधे में आम भी लग जाता है। परन्तु है यह सब तमाशा। तमाशा दिखानेवाला बाजीगर ही सत्य है।
मणि – जीवन जैसे एक लम्बी नींद है! इतना ही समझता हूँ कि सब ठीक ठीक नहीं देख रहा हूँ। जिस मन से मैं आकाश को नहीं समझता, उसी मन से संसार को देख रहा हूँ न? अतएव देखना किस तरह से ठीक होगा?
श्रीरामकृष्ण – एक तरह और है। आकाश को हम लोग ठीक नहीं देख रहे, जान पड़ता है वह जमीन से मिला हुआ है। अतएव आदमी सत्य कैसे देखे? भीतर विकार जो है।
श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से गाने लगे।
(भावार्थ) – “हे शंकरि यह कैसा विकार है? तुम्हारी कृपा-औषधि मिलने पर ही यह दूर होगा। ...”
“विकार तो है ही। देखो न, संसारी जीव आपस में लड़ते हैं, परन्तु जिस आधार पर लड़ते हैं वह बेजड़ है। लड़ाई भी कैसी! तेरा यह हो, तेरा वह हो। कितनी चिल्लाहट
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