श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२३ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५४ ३१३
से तन्त्रमत के अनुसार साधना करने का उपदेश दिया था, और ईशान से कहा था, 'जो ब्रह्म हैं, वही माँ, वही आद्याशक्ति हैं।'
श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर कह रहे हैं, “फिर गायत्री का पुरश्चरण! इस छत पर से उस छत पर कूदना! किसने उससे ऐसी बात कही है? अपने ही मन से कर रहा है। अच्छा, थोड़ा पुरश्चरण करेगा।”
(मास्टर के प्रति) – “अच्छा, मुझे यह सब क्या वायु के विकार से होता है अथवा भाव से?”
मास्टर विस्मित होकर देख रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे हैं। वे विस्मित होकर देख रहे हैं, ईश्वर हमारे अति निकट, बाहर तथा भीतर हैं। अत्यन्त निकट हुए बिना श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे उनके साथ बातचीत कैसे कर रहे हैं?
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