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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 335 of 711

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Page 335
३१२श्रीरामकृष्णवचनामृत२३ सितम्बर, १८८३

दिन के चार बजे का समय हुआ। श्रीरामकृष्ण मुँह-हाथ धोने के लिए झाऊतल्ले की ओर गए। उनके कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में दरी बिछायी गयी। श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर उस पर बैठे। राम आदि उपस्थित हैं। अधर सेन जाति के सुनार हैं। उनके घर राखाल ने अन्नग्रहण कर लिया, इसलिए रामबाबू ने कुछ कहा है। अधर परम भक्त हैं। यही बातें हो रही हैं।

एक भक्त हँसी हँसी में सुनारों में से किसी किसी के स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं – स्वयं कोई राय प्रकट नहीं कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण की कर्मत्याग की स्थिति। जगन्माता के साथ वार्तालाप

सायंकाल हुआ। आँगन में उत्तर-पश्चिम के कोने में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं, वे समाधिस्थ हैं।

काफी देर बाद उनका मन बाह्य जगत् में लौटा। श्रीरामकृष्ण की कैसी अद्भुत स्थिति है! आजकल प्रायः समाधिमग्न रहते हैं। थोड़े ही उद्दीपन से बाह्यज्ञानशून्य हो जाते हैं। जब भक्तगण आते हैं, तब थोड़ा वार्तालाप करते हैं; अन्यथा सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं। अब पूजा, जप आदि नहीं कर सकते।

समाधि भंग होने के बाद खड़े खड़े ही जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ! पूजा गयी, जप गया। देखना माँ! कहीं जड़ न बना डालना। सेव्यसेवक-भाव में रखना माँ, जिससे बात कर सकू, तुम्हारा नाम-गुण – संकीर्तन और गान कर सकू। और शरीर में थोड़ा बल दो माँ! जिससे थोड़ा चलफिर सकूँ, जहाँ पर तुम्हारी कथा होती हो, जहाँ पर तुम्हारे भक्तगण हों, उन सब स्थानों में जा सकूँ।”

श्रीरामकृष्ण ने आज प्रातःकाल कालीमन्दिर में जाकर जगन्माता के श्रीचरणकमलों पर पुष्पांजलि अर्पण की है। वे फिर जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “माँ! आज सबेरे चरणों में दो फूल चढ़ाए। सोचा, अच्छा हुआ, फिर बाह्य पूजा की ओर मन जा रहा है! पर माँ, फिर ऐसा क्यों हुआ? फिर जड़ की तरह क्यों बना डाल रही हो?”

भाद्रपद कृष्णा सप्तमी। अभी तक चन्द्रमा का उदय नहीं हुआ। रात्रि तमसाच्छन्न है। श्रीरामकृष्ण अभी भावाविष्ट हैं, इसी स्थिति में अपने कमरे के छोटे तख्त पर बैठे। फिर जगन्माता के साथ बात कर रहे हैं।

अब सम्भवतः भक्तों के सम्बन्ध में माँ से कुछ कह रहे हैं। ईशान मुखोपाध्याय की बात कह रहे हैं। ईशान ने कहा था, 'मैं भाटपाड़ा में जाकर गायत्री का पुरश्चरण करूँगा।' श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था कि कलियुग में वेदमत नहीं चलता; जीव अन्नगतप्राण हैं, आयु कम है, देहबुद्धि, विषयबुद्धि सम्पूर्ण नष्ट नहीं होती। इसीलिए ईशान को मातृभाव