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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 331 of 711

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Page 331

३०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ सितम्बर, १८८३

का यज्ञ-याग ब्रह्ममयी के पादपद्म में है।”

ईशान सब सुनकर चुप होकर बैठे हैं।

बालक के समान विश्वास। जनक के समान, पहले साधन फिर संसार में ईश्वर लाभ।

श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और भी सन्देह हो तो पूछ लो।

ईशान – जी, आपने जो कहा है – विश्वास!

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक विश्वास के द्वारा ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। और पूरा विश्वास करने पर और भी शीघ्र प्रगति होती है। गौ यदि चुन-चुनकर खाती है तो दूध कम देती है, सभी प्रकार के घास-पत्ते खाने पर वह अधिक दूध देती है।

“राजकृष्ण बनर्जी के लड़के ने एक कहानी सुनायी थी कि एक व्यक्ति को आदेश हुआ कि इस भेड़ में ही तू अपना इष्ट देखना। उसने इसी पर विश्वास किया। सर्वभूतों में वे ही विराजमान हैं।”

“गुरु ने भक्त से कह दिया कि राम ही घट घट में विराजमान हैं। भक्त का उसी समय विश्वास हो गया! जब देखा एक कुत्ता मुँह में रोटी लेकर भाग रहा है, तो भक्त घी का पात्र हाथ में लेकर पीछे पीछे दौड़ता है और कहता है, 'राम, थोड़ा ठहरो, रोटी में घी तो लगा दूँ!'

“अहा! कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास था! कहा करता था, ‘ॐ कृष्ण ॐ राम’ इस मन्त्र का उच्चारण करने पर करोड़ों सन्ध्या-वन्दन का फल होता है।”

“फिर मुझे कृष्णकिशोर कान में कहा करता था, 'कहना नहीं किसी से; मुझे सन्ध्या-पूजा अच्छी नहीं लगती।”

“मुझे भी वैसा ही होता है। माँ दिखा देती हैं कि वे ही सब कुछ बनी हुई हैं। शौच के बाद मैदान से आ रहा था पंचवटी की ओर, देखा साथ साथ एक कुत्ता आ रहा है; तब पंचवटी के पास आकर थोड़ी देर खड़ा रहा; सोचा, शायद माँ इसके द्वारा कुछ कहलाए!

“इसलिए जैसा तुमने कहा, विश्वास से ही सब कुछ मिलता है।”

ईशान – परन्तु हम तो गृहस्थाश्रम में हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्या हानि है! उनकी कृपा होने पर असम्भव भी सम्भव हो जाता है। रामप्रसाद ने गाना गाया था, यह संसार धोखे की टट्टी है। उसका उत्तर किसी दूसरे ने एक दूसरे गाने में दिया था -

(भावार्थ) – “‘यह संसार आनन्द की कुटिया है। मैं खाता, पीता और आनन्द करता हूँ। जनक राजा बड़े तेजस्वी थे, उन्हें किस बात की कमी थी, वे तो दोनों ओर संभाले रखकर आनन्द से दूध पीते थे।’

“परन्तु पहले निर्जन में गुप्त रूप से साधन-भजन करके ईश्वर को प्राप्त करने के