Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 330 of 711

Read in context
Page 330

२२ सितम्बर, १८८३

परिच्छेद ५३

३०७

साक्षात् द्रोणाचार्य मानकर। इसी से वह धनुर्विद्या में सिद्ध हो गया!

“और तुम ब्राह्मण-पण्डितों को लेकर अधिक झमेला न किया करो। उन्हें चिन्ता है दो पैसे पाने की!”

“मैंने देखा है, ब्राह्मण स्वस्त्ययन करने आया है; चण्डीपाठ या और कुछ पाठ कर रहा है - पर आधे पन्ने वैसे ही उलटता जा रहा है। (सभी हँस पड़े।)

“अपनी हत्या एक छोटी नहरनी से भी हो सकती है। दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार चाहिए। - शास्त्रग्रन्थादि का यही हेतु है।”

“बहुतसे शास्त्रों की भी कोई आवश्यकता नहीं है। यदि विवेक न हो तो केवल पाण्डित्य से कुछ नहीं होता, षट्शास्त्र पढ़कर भी कुछ नहीं होता। निर्जन में, एकान्त में, गुप्त रूप से रो-रोकर उन्हें पुकारो, वे ही सब कुछ कर देंगे।”

श्रीरामकृष्ण ने सुना है, ईशान भाटपाड़ा में पुरश्चरण करने के लिए गंगा के तट पर कुटिया बना रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (व्यग्र भाव से ईशान के प्रति) – क्यों जी, क्या कुटिया बन गयी? जानते हो, ये सब काम लोगों से जितने छिपे रहें, उतना ही अच्छा है। जो लोग सतोगुणी हैं, वे ध्यान करते हैं मन में, कोने में, वन में; कभी तो मच्छरदानी के भीतर ही बैठे ध्यान करते हैं।

हाजरा महाशय को ईशान बीच बीच में भाटपाड़ा ले जाते हैं। हाजरा महाशय छूतधर्मी की तरह आचरण करते हैं। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें वैसा करने से मना किया था।

श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और देखो, अधिक छूतधर्म का आचरण मत करो। एक साधु को बड़ी प्यास लगी थी। भिश्ती जल लेकर जा रहा था; उसने साधु को जल देना चाहा। साधु ने कहा, 'क्या तुम्हारी मशक साफ है?' भिश्ती बोला, 'महाराज, मेरी मशक खूब साफ है! परन्तु आपकी मशक के भीतर मल-मूत्र आदि अनेक प्रकार के मैल हैं। इसलिए कहता हूँ, मेरी मशक से जल पीजिए, इससे दोष न लगेगा।' आपकी मशक अर्थात् आपकी देह, आपका पेट।

“और उनके नाम पर विश्वास रखो। तो फिर तीर्थ आदि की भी आवश्यकता न होगी।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) – “यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे शरीर का अन्त हो तो गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि कौन चाहता है? जो तीनों समय काली का नाम लेता है, वह क्या पूजा-सन्ध्या चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में रहकर भी पता नहीं पाती। कालीनाम के इतने गुण हैं कि कौन उसका पार पा सकता है। उन गुणों को देवाधिदेव महादेव पंचमुखों से गाते हैं। दया, व्रत, दान आदि और किसी में भी मन नहीं जाता, मदन