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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 238 of 711

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Page 238

४ जून, १८८३ | परिच्छेद ३६ | २१५

(२)

श्रीरामकृष्ण का प्रेमोन्माद और रूपदर्शन

श्रीरामकृष्ण – ओह, कैसी अवस्था बीत गयी है! पहले जब ऐसी अवस्था हुई थी तो रातदिन कैसे बीत जाते थे, कह नहीं सकता। सब कहने लगे थे, पागल हो गया; इसीलिए इन लोगों ने शादी कर दी। उन्माद अवस्था थी। पहले स्त्री के बारे में चिन्ता हुई, बाद में सोचा कि वह भी इसी प्रकार रहेगी, खाएगी, पिएगी। ससुराल गया, वहाँ भी खूब संकीर्तन हुआ। नफर, दिगम्बर बनर्जी के पिता आदि सब लोग आये। खूब संकीर्तन होता था। कभी कभी सोचता था, क्या होगा। फिर कहता था, माँ, गाँव के जमींदार यदि मानें तो समझूँगा यह अवस्था सत्य है। और सचमुच वे भी आप ही आने लगे और बातचीत करने लगे।

पूर्वकथा – सुन्दरीपूजा – और कुमारीपूजा, रामलीला – दर्शन

“कैसी अवस्था बीत गयी है! किंचित् ही कारण से एकदम भगवान् की उद्दीपना होती थी। मैंने सुन्दरी-पूजा की। चौदह वर्ष की लड़की थी। देखा साक्षात् माँ जगदम्बा! रुपये देकर मैंने प्रणाम किया।

“रामलीला देखने के लिए गया तो सीता, राम, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, सभी को साक्षात् प्रत्यक्ष देखा। तब जो जो बने थे उनकी पूजा करने लगा।

“कुमारी कन्याओ को बुलाकर उनकी पूजा करता – देखता साक्षात् माँ जगदम्बा।

“एक दिन बकुलवृक्ष के तले देखा, नीला वस्त्र पहने हुए एक स्त्री खड़ी है। वह वेश्या थी, पर मेरे मन में एकदम सीता की उद्दीपना हो गयी। उस स्त्री को बिलकुल भूल गया और देखा साक्षात् सीतादेवी लंका से उद्धार पाकर राम के पास जा रही हैं। बहुत देर तक बाह्य-संज्ञाहीन हो समाधि-अवस्था में रहा।

“और एक दिन कलकत्ते में किले के मैदान में घूमने के लिए गया था। उस दिन ‘बलून’ (गुब्बारा) उड़नेवाला था। बहुतसे लोगों की भीड़ थी। अचानक एक अंग्रेज बालक की ओर दृष्टि गयी, वह पेड़ के सहारे त्रिभंग होकर खड़ा था। देखते ही श्रीकृष्ण की उद्दीपना हो समाधि हो गयी।

“शिऊड़ गाँव में चरवाहों को भोजन कराया। सब के हाथ में मैंने जलपान की सामग्री दी। देखा, साक्षात् व्रज के ग्वालबाल! उनसे जलपान लेकर मैं भी खाने लगा।

“प्रायः होश न रहता था। मथुरबाबू ने मुझे ले जाकर जानबाजार के मकान में कुछ दिन रखा। मैं देखने लगा, साक्षात् माँ की दासी हो गया हूँ। घर की औरतें बिलकुल शरमाती नहीं थीं, जैसे छोटे छोटे बच्चों को देख कोई भी स्त्री लज्जा नहीं करती। रात को बाबू की कन्या को जमाई के पास पहुँचाने जाता।