श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context२१४ । श्रीरामकृष्णवचनामृत । ४ जून, १८८३
श्रीरामकृष्ण — तो इस बार जो हुआ सो हुआ। देखना, जिससे फिर ऐसा न होने पाए। जैसा नियम है वैसा ही हमेशा होना अच्छा है।
त्रैलोक्य यथोचित उत्तर देकर चले गए। कुछ देर बाद विष्णुमन्दिर के पुरोहित राम चटर्जी आए।
श्रीरामकृष्ण — राम, मैंने त्रैलोक्य से कहा, इस साल 'यात्रा' नहीं हुई, देखना जिससे आगे ऐसा न हो। तो क्या यह कहना ठीक हुआ?
राम — महाराज, उससे क्या हुआ! अच्छा ही तो कहा। जैसा नियम है उसी प्रकार हमेशा होना चाहिए।
श्रीरामकृष्ण (बलराम से) — अजी, आज तुम यहीं भोजन करो।
भोजन के कुछ पहले श्रीरामकृष्णदेव अपनी अवस्था के सम्बन्ध में भक्तों को बहुत बातें बताने लगे। राखाल, बलराम, मास्टर, रामलाल तथा और दो-एक भक्त बैठे थे।
श्रीरामकृष्ण — हाजरा मुझे उपदेश देता है कि तुम इन लड़कों के लिए इतनी चिन्ता क्यों करते हो! गाड़ी में बैठकर बलराम के मकान पर जा रहा था, उसी समय मन में बड़ी चिन्ता हुई। कहने लगा, 'माँ, हाजरा कहता है, नरेन्द्र आदि बालकों के लिए मैं इतनी चिन्ता क्यों करता हूँ; वह कहता है, ईश्वर की चिन्ता त्यागकर इन लड़कों की चिन्ता आप क्यों करते हैं?' मेरे यह कहते कहते अचानक माँ ने दिखलाया कि वे ही मनुष्य रूप में लीला करती हैं। शुद्ध आधार में उनका प्रकाश स्पष्ट होता है। इस दर्शन के बाद जब समाधि कुछ टूटी तो हाजरा के ऊपर बड़ा क्रोध हुआ। कहा, साले मेरा मन खराब कर दिया था। फिर सोचा, उस बेचारे का अपराध ही क्या है; वह यह कैसे जान सकता है?
"मैं इन लोगों को साक्षात् नारायण जानता हूँ। नरेन्द्र के साथ पहले भेंट हुई। देखा, देहबुद्धि नहीं है। जरा छाती को स्पर्श करते ही उसका बाह्य-ज्ञान लोप हो गया। होश आने पर कहने लगा, 'आपने यह क्या किया! मेरे तो माता-पिता हैं।' यदु मल्लिक के मकान में भी ऐसा ही हुआ था। क्रमशः उसे देखने के लिए व्याकुलता बढ़ने लगी, प्राण छटपटाने लगे। तब भोलानाथ* से कहा, 'क्यों जी, मेरा मन ऐसा क्यों होता है? नरेन्द्र नाम का एक कायस्थ लड़का है, उसके लिए ऐसा क्यों होता है?' भोलानाथ बोले, 'इस सम्बन्ध में महाभारत में लिखा है कि समाधिवान् पुरुष का मन जब नीचे उतरता है, तब सतोगुणी लोगों के साथ विलास करता है। सतोगुणी मनुष्य देखने से उसका मन शान्त होता है।' — यह बात सुनकर मेरे चित्त को शान्ति मिली। बीच बीच में नरेन्द्र को देखने के लिए मैं बैठा बैठा रोया करता था।"
* भोलानाथ मुखर्जी ठाकुरवाड़ी के मुन्शी थे, बाद में खजांची हुए थे।