श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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परिच्छेद ३४
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में खड़े खड़े भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। रविवार, वैशाख कृष्णा पंचमी, २७ मई १८८३ ई.। दिन के नौ बजे का समय होगा। भक्तगण धीरे धीरे आकर उपस्थित हो रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि भक्तों के प्रति) – विद्वेषभाव अच्छा नहीं, – शाक्त, वैष्णव, वेदान्ती ये सब झगड़ा करते हैं, यह ठीक नहीं। पद्मलोचन बर्दवान के सभापण्डित थे। सभा में विचार हो रहा था – ‘शिव बड़े हैं या ब्रह्मा।’ पद्मलोचन ने बहुत सुन्दर बात कही थी, – ‘मैं नहीं जानता, मुझसे न शिव का परिचय है, और न ब्रह्मा का!’ (सभी हँसने लगे।)
“व्याकुलता रहने पर सभी पथों से उन्हें प्राप्त किया जाता है, परन्तु निष्ठा रहनी चाहिए। निष्ठा-भक्ति का दूसरा नाम है अव्यभिचारिणी भक्ति, – जिस प्रकार एक शाखावाला वृक्ष सीधा ऊपर की और जाता है। व्यभिचारिणी भक्ति – जैसे पाच शाखावाला वृक्ष। गोपियों की ऐसी निष्ठा थी कि वृन्दावन के पीताम्बर और ‘मोहनचूड़ावाले गोपालकृष्ण के अतिरिक्त और किसी से प्रेम न करेंगी। मथुरा में जब राजवेष में सिर पर पगड़ी पहने कृष्ण को देखा तो उन्होंने घूँघट की आड़ में मुँह छिपा लिया और कहा, ‘वह कौन है? क्या इसके साथ बात करके हम द्विचारिणी बनेंगी?’
“स्त्री जो स्वामी की सेवा करती है वह भी निष्ठा-भक्ति है। देवर, जेठ को खिलाती है, पैर धोने को जल देती है, परन्तु स्वामी के साथ दूसरा ही सम्बन्ध रहता है। इसी प्रकार अपने धर्म में भी निष्ठा हो सकती है। इसीलिए दूसरे धर्म से घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके साथ मीठा व्यवहार करना चाहिए।”
श्रीरामकृष्ण द्वारा जगन्माता की पूजा तथा आत्मपूजा
श्रीरामकृष्ण गंगास्नान करके काली के दर्शन करने गए हैं। साथ में मास्टर हैं। श्रीरामकृष्ण पूजा के आसन पर बैठकर माँ के चरणकमलों पर फूल चढ़ा रहे हैं; बीच बीच में अपने सिर पर भी चढ़ा रहे हैं और ध्यान कर रहे हैं।
बहुत समय के बाद श्रीरामकृष्ण आसन से उठे। भाव में विभोर होकर नृत्य कर रहे हैं और मुँह से माँ का नाम ले रहे हैं। कह रहे हैं, ‘माँ विपदनाशिनी।’ देह धारण करने से
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