Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 223 of 711

Read in context
Page 223

२०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ मई, १८८३

ब्राह्मभक्त नीचे आँगन और बरामदे में टहल रहे हैं।

रात के नौ बज गए। श्रीरामकृष्ण को दक्षिणेश्वर लौट जाना है। घर के मालिक निमन्त्रित गृही भक्तों की संवर्धना में इतने व्यस्त हैं कि श्रीरामकृष्ण की कोई खबर ही नहीं ले सकते।

श्रीरामकृष्ण (राखाल आदि से) – अरे, कोई बुलाता भी तो नहीं।

राखाल – (क्रोध में) – महाराज, आइए, हम दक्षिणेश्वर चलें।

श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – अरे ठहर। गाड़ी का किराया – तीन रुपये – दो आने – कौन देगा? चिढ़ने से ही काम न चलेगा! पैसे का नाम नहीं, और थोथी झाँझ! फिर इतनी रात को खाऊँ कहाँ?

बड़ी देर में सुना गया कि पत्तलें बिछी हैं। सब भक्त एक साथ बुलाए गए। उस भीड़ में श्रीरामकृष्ण भी राखाल आदि के साथ दूसरे मंजले में भोजन करने चले। भीड़ में बैठने की जगह नहीं मिलती थी। बड़ी मुश्किल से श्रीरामकृष्ण एक तरफ बैठाये गए। स्थान भद्दा था। एक रसोइया ठकुराइन ने भाजी परोसी। श्रीरामकृष्ण को उसे खाने की रुचि नहीं हुई। उन्होंने नमक के सहारे एक आध पूड़ी और थोड़ीसी मिठाई खायी।

आप दयासागर हैं। गृहस्वामी लड़के हैं। वे आपकी पूजा करना नहीं जानते तो क्या आप उनसे नाराज होंगे? अगर आप बिना खाए चले जायें तो उनका अमंगल होगा। फिर उन्होंने तो ईश्वर के ही उद्देश्य से इतना आयोजन किया।

भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। गाड़ी का किराया कौन दे? उस भीड़ में गृहस्वामियों का पता ही नहीं चलता था। इस किराये के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण ने बाद में विनोद करते हुए भक्तों से कहा था –

“गाड़ी का किराया माँगने गया! पहले तो उसे भगा ही दिया। फिर बड़ी कोशिश से तीन रुपये मिले, पर दो आने नहीं दिए। कहा कि उसी से हो जायगा!”