Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 222 of 711

Read in context
Page 222

२ मई, १८८३ परिच्छेद ३२ १९९

"जिसको ठीक विश्वास है कि ईश्वर ही कर्ता हैं और मैं अकर्ता हूँ, वह पाप नहीं कर सकता। जिसने नाचना सीख लिया है उसके पैर ताल के विरुद्ध नहीं पड़ते।

"मन शुद्ध न होने से यह विश्वास ही नहीं होता कि ईश्वर है!"

श्रीरामकृष्ण उपासना-मन्दिर में एकत्रित भक्तों को देख रहे हैं और कहते हैं, "बीच बीच में इस तरह एक साथ मिलकर ईश्वर-चिन्तन करना और उनके नामगुण गाना बहुत अच्छा है।

"परन्तु संसारी लोगों का ईश्वरानुराग क्षणिक है – वह उतनी ही देर तक ठहरता है जितना तपाये हुए लोहे पर पानी का छिड़काव।"

ब्रह्मोपासना तथा श्रीरामकृष्ण

अब सन्ध्या की उपासना होगी। वह बड़ा कमरा भक्तों से भर गया। कुछ ब्राह्म महिलाएँ हाथों में संगीत-पुस्तक लिए कुर्सियों पर आ बैठीं।

पियानो और हारमोनियम के सहारे ब्रह्मसंगीत होने लगा। गाना सुनकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा न रही। क्रमशः उद्बोधन, प्रार्थना और उपासना हुई। आचार्य वेदी पर बैठ वेदों से मन्त्रपाठ करने लगे।

"ॐ पिता नोऽसि, पिता नो बोधि। नमस्तेऽस्तु मा मा हिंसीः।
– तुम हमारे पिता हो, हमें सद्बुद्धि दो। तुम्हें नमस्कार है। हमें नष्ट न करो।"

ब्राह्मभक्त उनसे स्वर मिलाकर कहते हैं –

"ॐ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। आनन्दरूपममृतं यद्विभाति। शान्तं शिवमद्वैतम्। शुद्धमपापविद्धम्।"

फिर आचार्यों ने स्तवपाठ किया। –

"ॐ नमस्ते सते ते जगत्कारणाय। नमस्ते चिते सर्वलोकाश्रयाय।।" इत्यादि।

तदन्तर उन्होंने प्रार्थना की –

"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय। आविराविर्म एधि।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम्।*

स्तोत्रादि का पाठ सुनकर श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हो रहे हैं। अब आचार्य निबन्ध पढ़ते हैं।

अहेतुक कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण

उपासना समाप्त हो गयी। भक्तों को खिलाने का प्रबन्ध हो रहा है। अधिकांश


* "मुझे अनित्य से नित्य को, अन्धकार से ज्योति को और मृत्यु से अमरत्व को पहुँचाओ। मेरे पास आविर्भूत होओ। हे रुद्र, अपने कारुण्यपूर्ण मुख से सदा मेरी रक्षा करो।"