श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context१९६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ अप्रैल, १८८३
गए।
“थोड़ी देर के बाद तीसरा डाकू लौट आया। आकर बोला, 'खेद है; तुमको बहुत कष्ट हुआ? मैं तुम्हारा बन्धन खोले देता हूँ।' बन्धन खोलने के बाद उस व्यक्ति को साथ लेकर डाकू रास्ता दिखाता हुआ चलने लगा। सरकारी रास्ते के पास आकर उसने कहा, 'इस रास्ते से चले जाओ; अब तुम सहज ही अपने घर जा सकोगे।' उस व्यक्ति ने कहा, 'यह क्या महाशय? आप भी चलिए! आपने मेरा कितना उपकार किया! हमारे घर पर चलने से हम कितने आनन्दित होंगे!' डाकू ने कहा, 'नहीं, मेरे वहाँ जाने पर छुटकारे का उपाय नहीं, पुलिस पकड़ लेगी।' यह कहकर रास्ता बताकर वह लौट गया।
“पहला डाकू तमोगुण है, जिसने कहा था, 'इसे रखकर क्या करोगे, मार डालो।' तमोगुण से विनाश होता है। दूसरा डाकू रजोगुण है; रजोगुण से मनुष्य संसार में आबद्ध होता है; अनेकानेक कार्यों में जकड़ जाता है। रजोगुण ईश्वर को भुला देता है। सत्त्वगुण ही केवल ईश्वर का रास्ता बताता है। दया, धर्म, भक्ति यह सब सत्त्वगुण से उत्पन्न होते हैं। सत्त्वगुण मानो अन्तिम सीढ़ी है। उसके बाद ही है छत। मनुष्य का धाम है परब्रह्म। त्रिगुणातीत न होने पर ब्रह्मज्ञान नहीं होता।”
आचार्य – अच्छा हुआ, ये सब बड़ी अच्छी बातें हुईं।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – भक्त का स्वभाव क्या है, जानते हो? मैं कहूँ, तुम सुनो; तुम कहो, मैं सुनूँ। तुम लोग आचार्य हो, कितने लोगों को शिक्षा दे रहे हो। तुम लोग जहाज हो, हम तो हैं मछुओं की छोटी नैया। (सभी हँस पड़े।)
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