Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

Page 218 of 711

Read in context
Page 218

.२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९५

नहीं हुआ।* अर्थात् ब्रह्म क्या है, कोई मुँह से कह नहीं सका। मुख से बोलने से ही चीज उच्छिष्ट हो जाती है।' विद्यासागर विद्वान् हैं, यह सुनकर बहुत खुश हुए।

“सुना है, केदार के उस तरफ बरफ से ढका पहाड़ है। अधिक ऊँचाई पर उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।

उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।

“उनका दर्शन होने पर मनुष्य आनन्द से विह्वल हो जाता है, चुप हो जाता है। खबर कौन देगा? समझाएगा कौन?

“सात फाटकों से परे राजा है। प्रत्येक फाटक पर एक एक महा ऐश्वर्यवान पुरुष बैठे है। प्रत्येक फाटक में शिष्य पूछ रहा है, ‘क्या यही राजा है?’ गुरु भी कह रहे हैं नहीं;’ नेति नेति। सातवें फाटक पर जाकर जो कुछ देखा, एकदम अवाक् रह गए! आनन्द से विह्वल हो गए। फिर यह पूछना न पडा कि क्या यही राजा है? देखते ही सब सन्देह मिट गये।†

आचार्य – जी हाँ, वेदान्त में इसी प्रकार सब लिखा है।

•श्रीरामकृष्ण – जब वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय करते हैं, तब हम उन्हें सगुण ब्रह्म, आद्याशक्ति कहते हैं। जब वे तीनों गुणों से अतीत हैं, तब उन्हें निर्गुण ब्रह्म, वाक्य-मन के अतीत परब्रह्म कहा जाता है।

“मनुष्य उनकी माया में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। इस बात को भूल जाता है कि वह अपने पिता के अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी है। उनकी माया त्रिगुणमयी है। ये तीनों ही गुण डाकू हैं। सब कुछ हर लेते हैं, हमारे स्वरूप को भुला देते हैं। सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं। इनमें से केवल सत्त्वगुण ही ईश्वर का रास्ता बताता है; परन्तु ईश्वर के पास सत्त्वगुण भी नहीं ले जा सकता।

“एक धनी जंगल के बीच में से जा रहा था। ऐसे समय तीन डाकुओं ने आकर उसे घेर लिया और उसका सब कुछ छीन लिया। सब कुछ छीनकर एक डाकू ने कहा, ‘अब इसे रखकर क्या करोगे! इसे मार डालो।’ ऐसा कहकर वह उसे काटने गया। दूसरा डाकू बोला, ‘जान से मत मारो; हाथ-पैर बाँधकर इसे यहीं पर छोड दिया जाय, तो फिर यह पुलिस को खबर नहीं दे सकेगा।’ यह कहकर उसे बाँधकर डाकू लोग वहीं छोड़कर चले


* अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् अद्वैतम्। – माण्डूक्य उपनिषद्, ७
† यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहं। – तैत्तिरीय उपनिषद् २। ९। १