श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in contextपरिच्छेद २८
नरेन्द्र आदि भक्तों के साथ बलराम के मकान पर
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बलराम बाबू के मकान में बैठे हुए हैं, बैठक के उत्तर-पूर्ववाले कमरे में। दोपहर ढल चुकी, एक बजा होगा। नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, बलराम और मास्टर कमरे में उनके साथ बैठै हुए हैं।
आज अमावस्या है, शनिवार, ७ अप्रैल १८८३। श्रीरामकृष्ण बलराम बाबू के घर सुबह को आए थे। दोपहर को भोजन वहीं किया हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल तथा और भी दो-एक भक्तों को आपने निमन्त्रित करने के लिए कहा था, अतएव उन लोगों ने भी यहीं आकर भोजन किया है। श्रीरामकृष्ण बलराम से कहते थे – “इन्हें खिलाना, तो बहुतसे साधुओं को खिलाने का पुण्य होगा।”
कुछ दिन हुए श्रीरामकृष्ण श्री केशवबाबू के यहाँ 'नववृन्दावन' नाटक देखने गए थे। साथ नरेन्द्र और राखाल भी गए थे। नरेन्द्र ने भी अभिनय में भाग लिया था। केशव पवहारी बाबा बने थे।
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्रादि भक्तों से) – केशव साधु बनकर शान्तिजल छिड़कने लगा। परन्तु मुझे यह अच्छा न लगा। अभिनय में शान्तिजल!
“और एक आदमी (कु. बाबू) पापपुरुष बना था। ऐसा करना भी अच्छा नहीं। न पाप करना ही अच्छा है और न पाप का अभिनय करना ही।”
नरेन्द्र का स्वास्थ्य अच्छा नहीं हैं; परन्तु उनका गाना सुनने की श्रीरामकृष्ण को बड़ी इच्छा है। वे कहने लगे “नरेन्द्र, ये लोग कह रहे हैं, तू कुछ गा।”
नरेन्द्र तानपुरा लेकर गाने लगे। गीतों का भावार्थ यह है –
(१) “मेरे प्राण-पिंजरे के पक्षी, गाओ। ब्रह्म-कल्पतरु पर बैठकर परमात्मा के गुण गाओ! धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-रूपी पके हुए फल खाओ। हे मेरे हृदय के प्राणविहंग, तुम निरन्तर 'आत्माराम, प्राणाराम' कहकर पुकारो। प्यासे चातक की तरह पुकारो, आलस मत करो।”
(२) “वे विश्वरंजन हैं, परमज्योति ब्रह्म हैं, अनादिदेव जगत्पति हैं, प्राणों के भी प्राण हैं।...”