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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

Page 193 of 711

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Page 193
१७०श्रीरामकृष्णवचनामृत२१ मार्च, १८८३

समाधितत्त्व – सविकल्प और निर्विकल्प

अमृत – महाराज! इस समाधि-अवस्था में भला आपको क्या जान पड़ता है?

श्रीरामकृष्ण – सुना नहीं? भौंरे की चिन्ता करते करते झींगुर भौंरा ही बन जाता है। वह अनुभव कैसा होता है जानते हो? मानो हण्डी की मछली को गंगा में छोड़ दिया हो।

अमृत – क्या जरा भी अहंकार नहीं रह जाता?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बहुधा मेरा कुछ अहंकार रह जाता है। सोने के एक टुकड़े को तुम चाहे जितना घिस डालो पर अन्त में एक छोटासा कण बचा ही रहता है। और, जैसे कोई बड़ी भारी अग्निराशी है, उसकी एक जरासी चिनगारी हो। बाह्य ज्ञान चला जाता है, परन्तु प्रायः थोड़ासा अहंकार रह जाता है, शायद वे विलास के लिए रख छोड़ते हैं। ‘मैं’ और ‘तुम’ इन दोनों के रहने ही से स्वाद मिलता है। कभी कभी इस ‘अहं’ को भी वे मिटा देते हैं। इसे ‘जड़ समाधि’ या ‘निर्विकल्प समाधि’ कहते हैं। तब क्या अवस्था होती है, यह कहा नहीं जा सकता! नमक का पुतला समुद्र नापने गया था। ज्योंही समुद्र में उतरा कि गल गया। ‘तदाकाराकारित’! अब लौटकर कौन बतलाये कि समुद्र कितना गहरा है!

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