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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 128 of 711

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Page 128

२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | १०५

की बड़ी चर्चा चलती रही। ज्योंही तुम आए कि वे सब बातें बन्द हो गयीं। तब तुम्हारे दर्शन से ही आनन्द मिलने लगा। लोग कहने लगे, ‘यह लो, शिवनाथ बाबू आ गए।’ फिर तुम्हारे बारे में और सब बातें बन्द हो जाती हैं।

“मेरी यह अवस्था होने पर गंगा में तर्पण करने के लिए जाकर मैंने देखा, उँगलियों के भीतर से पानी गिरा जा रहा है। तब हलधारी से रोते हुए पूछा, दादा, यह क्या हो गया ! हलधारी बोला, इसे ‘गलितहस्त’ कहते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद तर्पणादि कर्म नहीं रह जाते।

“संकीर्तन करते समय पहले कहते हैं, ‘निताई आमार माता हाथी!’ ‘निताई आमार माता हाथी!’ (मेरा निताई मतवाले हाथी की तरह नाच रहा है) भाव गहरा होने पर सिर्फ ‘हाथी हाथी’ कहते हैं। इसके बाद केवल ‘हाथी’ शब्द मुँह में लगा रहता है। अन्त को ‘हा’ कहते हुए भाव-समाधि होती है। तब वे जो अब तक कीर्तन कर रहे थे, चुप हो जाते हैं।

“जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है। जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा बहुत-कुछ घट जाता है। केवल ‘पूड़ी लाओ, पूड़ी लाओ’ की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् (सब हँसते हैं।) – शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा। तब सब चुप!

“इसीलिए कहा कि पहले-पहल कामों की बड़ी रेलपेल रहती है। ईश्वर के रास्ते पर जितना बढ़ोगे उतने ही कर्म घटते जायेंगे। अन्त को कर्म छूट जाते हैं। और समाधि होती है।

“गृहस्थ की बहू के गर्भवती होने पर उसकी सास काम घटा देती है। दसवें महीने में काम अक्सर नहीं करना पड़ता। लड़का होने पर उसका काम बिलकुल छूट जाता है। फिर वह सिर्फ लड़के की देखभाल में रहती है। घर-गृहस्थी का काम सास, ननद, जेठानी ये ही सब करती हैं।

समाधि के बाद लोकशिक्षा

“समाधिस्थ होने के बाद प्रायः शरीर नहीं रहता। किसी किसी का शरीर लोक-शिक्षण के लिए रह जाता है, – जैसे नारदादिकों का और चैतन्य जैसे अवतारपुरुषों का। कुआँ खुद जाने पर कोई कोई झौवा कुदाल फेंक देते हैं। कोई कोई रख लेते हैं, – सोचते हैं, शायद पड़ोस में किसी दूसरे को जरूरत पड़े। इसी प्रकार महापुरुष जीवों का दुःख देखकर विकल हो जाते हैं। ये स्वार्थी नहीं होते कि अपने ही ज्ञान से मतलब रखें। स्वार्थी लोगों की कथा तो जानते हो। कटी उँगली पर भी नहीं मूतते कि कहीं दूसरे का उपकार न हो जाय। (सब हँसे।) एक पैसे की बर्फी दूकान से ले आने को कहो तो उसमें से भी