श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| १०२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ अक्टूबर, १८८२ |
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ईश्वरदर्शन - साकार तथा निराकार
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा, “महाराज, ईश्वर को क्या कोई देख सकता है? अगर देख सकता है तो हमें वे क्यों नहीं देखने को मिलते?”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे अवश्य देखने को मिलते हैं। साकार रूप देखने में आता है और फिर अरूप भी दीख पड़ता है, परन्तु यह तुम्हें समझाऊँ किस तरह?
ब्राह्मभक्त – हम उन्हें किस उपाय से देख सकते हैं?
श्रीरामकृष्ण – व्याकुल होकर उनके लिए रो सकते हो? लड़के के लिए, स्त्री के लिए, धन के लिए लोग आँसुओं की झड़ी बाँध देते हैं, परन्तु ईश्वर के लिए कौन रोता है? जब तक लड़का खिलौने पर भूला रहता है तब तक माँ रोटी पकाना आदि घरगृहस्थी के कामों में लगी रहती है। जब लड़के को खिलौना नहीं सुहाता, उसे फेंक, गला फाड़कर रोने लगता है, तब माँ तवा उतारकर दौड़ आती है, – बच्चे को गोद में उठा लेती है।
ब्राह्मभक्त – महाराज, ईश्वर के स्वरूप पर इतने भिन्न भिन्न मत क्यों हैं? कोई कहता है साकार और कोई कहता है निराकार। फिर साकारवादियों से तो अनेक रूपों की चर्चा सुन पड़ती है। यह गोरखधन्धा क्यों रचा है?
श्रीरामकृष्ण – जो भक्त जिस प्रकार देखता है वह वैसा ही समझता है। वास्तव में गोरखधन्धा कुछ भी नहीं। यदि उन्हें कोई किसी तरह एक बार प्राप्त कर सके, तो वे सब समझा देते हैं। उस मुहल्ले में गए ही नहीं, – कुल खबर कैसे पाओगे?
“एक कहानी सुनो। एक आदमी शौच के लिए जंगल गया। उसने देखा कि पेड़ पर एक जन्तु बैठा है। लौटकर उसने एक दूसरे से कहा – ‘देखो जी, उस पेड़ पर हमने एक लाल रंग का सुन्दर जीव देखा है।’ उस आदमी ने जवाब दिया – ‘जब मैं शौच के लिए गया था तब मैंने भी देखा; पर उसका रंग लाल तो नहीं है – वह तो हरा है!’ तीसरे ने कहा – ‘नहीं जी नहीं, हमने भी देखा है, पीला है।’ इसी प्रकार और भी कुछ लोग थे जिनमें से किसी ने कहा भूरा, किसी ने बैंगनी, किसी ने आसमानी आदि आदि। अन्त में लड़ाई ठन गयी। तब उन लोगों ने पेड़ के नीचे जाकर देखा। वहाँ एक आदमी बैठा था। पूछने पर उसने कहा – ‘मैं इसी पेड़ के नीचे रहता हूँ। उस जीव को मैं खूब पहचानता हूँ। तुम लोगों ने जो कुछ कहा, सब सत्य है। वह कभी लाल, कभी हरा, कभी पीला, कभी आसमानी और भी न जाने कितने रंग बदलता है। वह बहुरूपिया है। और फिर कभी देखता हूँ, कोई रंग नहीं!’
“अर्थात् जो मनुष्य सर्वदा ईश्वर-चिन्तन करता है, वही जान सकता है कि उनका स्वरूप क्या है। वही मनुष्य जानता है कि वे अनेकानेक रूपों में दर्शन देते हैं, अनेक भावों में दीख पड़ते हैं, – वे सगुण हैं और निर्गुण भी। जो पेड़ के नीचे रहता है वही जानता है कि उस बहुरूपिया के कितने रंग हैं, – फिर कभी कभी तो कोई भी रंग नहीं रहता। दूसरे