Skip to content
SarvaKosh
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 708 of 834

Read in context
Page 708
७०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| अष्टषष्टिपलेनैव हेम्ना कृत्वा सुदर्शनम्।<br>नवरत्नैरलङ्कृत्य दद्याद्वै दक्षिणां गुरोः॥ २६८<br><br>दशधेनु सवस्त्रं च दद्यात्क्षेत्रं सुशोभनम्।<br>शतद्रोणतिलं चैव शतद्रोणांश्च तण्डुलान्॥ २६९<br><br>शयनं वाहनं शय्यां सोपधानां प्रदापयेत्।<br>योगिनां चैव सर्वेषां त्रिंशत्पलमुदाहृतम्॥ २७०<br><br>अशेषांश्च तदर्धेन शिवभक्तांस्तदर्धतः।<br>महापूजां ततः कुर्यान्महादेवस्य वै नृपः॥ २७१ | मुकुट आदि दिव्य आभूषणों तथा रेशमी वस्त्रोंसे राजाको विभूषित करना चाहिये। राजाको चाहिये कि [इस अवसरपर] अड़सठ पल प्रमाणका एक सुदर्शन चक्र बनवाकर उसे नौ रत्नोंसे जटित कराकर गुरुको दक्षिणा प्रदान करे; साथ ही वस्त्रसहित दस गायें तथा उत्तम भूमि प्रदान करे। सौ द्रोण तिल, सौ द्रोण चावल, वाहन, विस्तर तथा तकियासहित शय्या भी [गुरुको] प्रदान करना चाहिये। योगियोंके लिये सुवर्णके तीस पलका दान बताया गया है और अन्य सामग्रियाँ आधी देनी चाहिये तथा शिवभक्तोंको उससे भी आधी प्रदान करनी चाहिये। तदनन्तर राजाको महादेवकी महापूजा करनी चाहिये॥ २६७-२७१॥ |
| एवं समासतः प्रोक्तं जयसेचनमुत्तमम्।<br>एवं पुराभिषिक्तस्तु शक्रः शक्रत्वमागतः॥ २७२<br><br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो विष्णुर्विष्णुत्वमागतः।<br>अम्बिका चाम्बिकात्वं च सौभाग्यमतुलं तथा॥ २७३<br><br>सावित्री च तथा लक्ष्मीर्देवी कात्यायनी तथा।<br>नन्दिनाथ पुरा मृत्यु रुद्राध्यायेन वै जितः॥ २७४<br><br>अभिषिक्तोऽसुरः पूर्वं तारकाख्यो महाबलः।<br>विद्युन्माली हिरण्याक्षो विष्णुना वै विनिर्जितः॥ २७५<br><br>नृसिंहेन पुरा दैत्यो हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>स्कन्देन तारकाद्याश्च कौशिक्या च पुराम्बया॥ २७६<br><br>सुन्दोपसुन्दतनयौ जितौ दैत्येन्द्रपूजितौ।<br>वसुदेवसुदेवौ तु निहतौ कृतकृत्यया॥ २७७<br><br>स्नानयोगेन विधिना ब्रह्मणा निर्मितेन तु।<br>दैवासुरे दितिसुता जिता देवैरनिन्दिताः॥ २७८<br><br>स्नाप्यैव सर्वभूपैश्च तथान्यैरपि भूसुरैः।<br>प्राप्ताश्च सिद्धयो दिव्या नात्र कार्या विचारणा॥ २७९ | इस प्रकार मैंने उत्तम जयाभिषेकका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। पूर्वकालमें इसी प्रकारसे अभिषिक्त होकर इन्द्रने इन्द्रत्व प्राप्त किया था। इसी प्रकार ब्रह्माको ब्रह्मत्व, विष्णुको विष्णुत्व तथा अम्बिकाको अम्बिकात्व प्राप्त हुआ था। सावित्री, भगवती लक्ष्मी तथा कात्यायनीने भी [इसी अभिषेकके प्रभावसे] अतुल सौभाग्य प्राप्त किया था। पूर्व कालमें रुद्राध्यायसे अभिषिक्त होकर नन्दीने मृत्युको भी जीत लिया था। इसी अभिषेकके प्रभावसे महाबली असुर तारक तथा विद्युन्माली देवताओंसे अजेय हो गये थे और भगवान् विष्णुने हिरण्याक्षको पराजित किया था। इसी प्रकार इसी स्नानयोगसे प्राचीनकालमें नृसिंहने दैत्य हिरण्यकशिपुका वध किया था, कार्तिकेयने तारक आदिका संहार किया था, अम्बा कौशिकीने बड़े-बड़े दैत्योंके द्वारा पूजित सुन्द-उपसुन्दके पुत्रोंको जीत लिया था और कृतकृत्याने वसुदेव तथा सुदेवका वध किया था। विधिपूर्वक ब्रह्माके द्वारा निर्मित इसी स्नानयोग (जयाभिषेक)-से देवासुर-संग्राममें देवताओंने प्रतापी दितिपुत्रोंको जीता था। सभी राजा तथा अन्य ब्राह्मणोंने भी अभिषिक्त होकर अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २७२-२७९॥ |
| अहोऽभिषेकमाहात्म्यमहो शुद्धसुभाषितम्।<br>येनैवमभिषिक्तेन सिद्धैर्मृत्युर्जितस्त्विति॥ २८० | इस अभिषेकका ऐसा माहात्म्य! यह कैसा पवित्र सुभाषित है कि जिसके द्वारा अभिषिक्त होनेके कारण |