श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
Page 707 of 834
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अध्याय २७ ] राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माणका वर्णन ७०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रधानं पूर्ववद्द्रव्यैरीशानेन द्विजोत्तमाः।<br>प्रतिद्रव्यं सहस्रेण जुहुयान्नृपसन्निधौ॥ २५५<br><br>स्वयं वा जुहुयादग्नौ भूपतिः शिववत्सलः।<br>ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां<br>ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु<br>सदाशिवोम्॥ २५६ | द्वारा पूर्वकथित द्रव्योंसे हवन करना चाहिये। हे द्विजश्रेष्ठो! प्रधान कुण्डमें भी ईशानमन्त्रके द्वारा पूर्ववत् सभी द्रव्योंसे हवन करना चाहिये। [आचार्यको] प्रत्येक कुण्डमें एक-एक हजार आहुति राजाकी सन्निधिमें प्रदान करनी चाहिये; अथवा ‘ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम्’—इस मन्त्रसे शिवभक्तिपरायण राजा अग्निमें स्वयं आहुति प्रदान करे॥ २५०—२५६॥ |
| प्रायश्चित्तमघोरेण शेषं सामान्यमाचरेत्।<br>कृताधिवासं राजानं शङ्खभेर्यादिनिस्वनैः॥ २५७<br><br>जयशब्दैर्वेदिव्यैर्वेदघोषैः सुशोभनैः।<br>सेचयेत्कूर्चतोयेन प्रोक्षयेद्वा नृपोत्तमम्॥ २५८<br><br>रुद्राध्यायेन विधिना रुद्रभस्माङ्गधारिणम्।<br>शङ्खचामरभेर्याद्यं छत्रं चन्द्रसमप्रभम्॥ २५९<br><br>शिविकां वैजयन्तीं च साधयेन्नृपतेः शुभाम्।<br>राज्याभिषेकयुक्ताय क्षत्रियायेश्वराय वा॥ २६०<br><br>नृपचिह्नानि नान्येषां क्षत्रियाणां विधीयते।<br>प्रमाणं चैव सर्वेषां द्वादशाङ्गुलमुच्यते॥ २६१<br><br>पलाशोदुम्बराश्वत्थवटाः पूर्वाद्दितः क्रमात्।<br>तोरणाद्यानि वै तत्र पट्टमात्रेण पट्टिकाः॥ २६२<br><br>अष्टमाङ्गुलसंयुक्तदर्भमालासमावृतम् ।<br>दिग्ध्वजाष्टकसंयुक्तं द्वारकुम्भैः सुशोभनम्॥ २६३<br><br>हेमतोरणकुम्भैश्च भूषितं स्नापयेन्नृपम्।<br>सर्वोपरि समासीनं शिवकुम्भेन सेचयेत्॥ २६४<br><br>तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि।<br>तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥ २६५<br><br>मन्त्रेणानेन विधिना वर्धन्या गौरिगीतया।<br>रुद्राध्यायेन वा सर्वमघोरायाथ वा पुनः॥ २६६<br><br>दिव्यैराभरणैः शुक्लैर्मुकुटाद्यैः सुकल्पितैः।<br>क्षौमवस्त्रैश्च राजानं तोषयेन्नियतं शनैः॥ २६७ | प्रायश्चित्त अघोरमन्त्रसे करना चाहिये तथा अवशिष्ट कर्म अन्य यागके समान करना चाहिये। शंख-भेरी आदिकी ध्वनि, जयकारकी ध्वनि तथा मंगलमय दिव्य वेद-ध्वनिके बीच रुद्राध्यायका पाठ करके अधिवासित राजाका कूर्च-जलसे अभिषेक करना चाहिये अथवा रुद्राक्ष एवं भस्म धारण किये हुए नृपश्रेष्ठका प्रोक्षण करना चाहिये। तत्पश्चात् आचार्यको चाहिये कि राजाके लिये शंख, चामर, भेरी, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् छत्र, पालकी, शुभ ध्वजा आदि साधन प्रस्तुत करे। राज्याभिषेकके योग्य क्षत्रियके लिये अथवा देवताके लिये ही ये सब राजचिह्न हैं; अन्य क्षत्रियोंके लिये अभिषेकका विधान नहीं है। पूर्वादिक्रमसे [चारों दिशाओंमें] पलाश, गूलर, पीपल और बरगदकी शाखाएँ बाँधनी चाहिये और [अभिषेक-मण्डपमें] तोरण आदि तथा रेशमके वस्त्रकी पट्टिका लगा देनी चाहिये। इसमें पलाश आदि सभीकी शाखाओंका प्रमाण बारह अंगुल बताया गया है। अभिषेक-मण्डपको आठ-आठ अंगुल प्रमाणवाले दर्भोंकी मालासे समावृत, आठों दिशाओंमें ध्वजासे अलंकृत, द्वारकुम्भोंसे सुशोभित तथा सुवर्णके तोरणमय कलशोंसे विभूषित करके राजाको स्नान कराना चाहिये। ‘तन्महेशाय विद्महे वाग्विशुद्धाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥’—इस मन्त्रके द्वारा शिवकुम्भके जलसे, गौरीगायत्री मन्त्रके द्वारा वर्धनीके जलसे और रुद्राध्याय अथवा अघोरमन्त्रके द्वारा सभी कुम्भोंके जलसे सर्वोच्च आसनपर विराजमान राजाका अभिषेक करना चाहिये॥ २५७—२६६॥<br><br>तदनन्तर उत्तम प्रकारसे निर्मित किये गये उज्ज्वल |