श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| ६८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| पापैरपि न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>लिङ्गस्य दर्शनं पुण्यं दर्शनात्स्पर्शनं वरम्॥ २८<br><br>अर्चनादधिकं नास्ति ब्रह्मपुत्र न संशयः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चनमुत्तमम्॥ २९<br><br>वर्षकोटिशतेनापि विस्तरेण न शक्यते॥ ३० | श्रेष्ठ होता है। लिङ्गार्चनमें संलग्न विप्र महापातकोंके द्वारा लगनेवाले पापोंसे भी कमलके पत्रपर स्थित जलकी भाँति लिप्त नहीं होता है। लिङ्गका दर्शन पुण्यप्रद होता है, दर्शनसे अधिक उत्तम लिङ्गका स्पर्श है, किंतु लिङ्गार्चनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है, हे ब्रह्मपुत्र! इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें उत्तम अघोरार्चनका वर्णन कर दिया; करोड़ों वर्षोंमें भी विस्तारके साथ इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है॥ २२—३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अघोरार्चनवर्णनं नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः॥ २६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अघोरार्चनवर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
राजाओंको विजयप्राप्ति करानेवाले विजयमण्डलके निर्माण तथा पूजनकी विधि एवं जयाभिषेकका वर्णन; स्वायम्भुव मनु और विभिन्न देवताओंके जयाभिषेकका विवरण
| ऋषय ऊचुः<br>प्रभावो नन्दिनश्चैव लिङ्गपूजाफलं श्रुतम्।<br>श्रुतिभिः सम्मितं सर्वं रोमहर्षण सुव्रत॥ १<br><br>जयाभिषेक ईशेन कथितो मनवे पुरा।<br>हिताय मेरुशिखरे क्षत्रियाणां त्रिशूलिना॥ २<br><br>तत्कथं षोडशविधं महादानं च शोभनम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत बुद्धिमतां वर॥ ३<br><br>सूत उवाच<br>जीवच्छ्राद्धं पुरा कृत्वा मनुः स्वायम्भुवः प्रभुः।<br>मेरुमासाद्य देवेशमस्तवीन्नीललोहितम्॥ ४<br><br>तपसा च विनीताय प्रहृष्टः प्रददौ भवः।<br>दिव्यं दर्शनमीशानस्तेनापश्यत्तमव्ययम्॥ ५<br><br>नत्वा सम्पूज्य विधिना कृताञ्जलिपुटः स्थितः।<br>हर्षगद्गदया वाचा प्रोवाच च ननाम च॥ ६ | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण! हे सुव्रत! हमलोगोंने [भगवान्] नन्दीका प्रभाव तथा वेदप्रतिपादित लिङ्गपूजाका फल—यह सब [आपसे] सुन लिया॥ १॥<br>त्रिशूलधारी महेश्वर शिवने क्षत्रियोंके कल्याणके लिये पूर्व कालमें मेरुपर्वतके शिखरपर स्वायम्भुव मनुको जयाभिषेकका उपदेश किया था, उसे बतायें; और हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतजी! उत्तम षोडशविध महादानका विधान क्या है—यह सब आप कृपापूर्वक हमलोगोंको बतायें॥ २-३॥<br>सूतजी बोले—प्राचीन कालमें प्रभु स्वायम्भुव मनुने जीवच्छ्राद्ध करके मेरुशिखरपर पहुँचकर देवेश्वर नीललोहितका स्तवन किया था॥ ४॥<br>तब उनकी तपस्यासे भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन विनम्र मनुको दिव्य दृष्टि प्रदान की; फलतः उन्होंने अव्यय शिवको देखा और उन्हें प्रणाम करके विधिवत् पूजा करके दोनों हाथ जोड़े हुए वे स्थित हो गये। मनुने शिवजीको पुनः प्रणाम किया और हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें उनसे कहा—॥ ५-६॥ |