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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 689 of 834

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Page 689

अध्याय २६ ] शिवलिङ्गमें अघोरार्चनकी विधि और उसका माहात्म्य ६८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सिंहाजिनाम्बरधरमघोरं परमेश्वरम्।<br>द्वात्रिंशाक्षररूपेण द्वात्रिंशच्छक्तिभिर्वृतम्॥ १६<br>सर्वाभरणसंयुक्तं सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>कपालमालाभरणं सर्पवृश्चिकभूषणम्॥ १७<br>पूर्णेन्दुवदनं सौम्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।<br>चन्द्ररेखाधरं शक्त्या सहितं नीलरूपिणम्॥ १८<br>हस्ते खड्गं खेटकं पाशमेके<br>रत्नैश्चित्रं चाङ्कुशं नागकक्षाम्।<br>शरासनं पाशुपतं तथास्त्रं<br>दण्डं च खट्वाङ्गमथापरे च॥ १९<br>तन्त्रीं च घण्टां विपुलं च शूलं<br>तथापरे डामरुकं च दिव्यम्।<br>वज्रं गदां टङ्कमेकं च दीप्तं<br>समुद्गरं हस्तमथास्य शम्भोः॥ २०<br>वरदाभयहस्तं च वरेण्यं परमेश्वरम्।<br>भावयेत्पूजयेच्चापि वह्नौ होमं च कारयेत्॥ २१किये हुए हैं, सिंहचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए हैं, बत्तीस अक्षरोंके रूपमें बत्तीस शक्तियोंसे आवृत हैं, समस्त प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हैं, सभी देवता उन्हें नमस्कार कर रहे हैं, वे नरमुण्डकी माला पहने हुए हैं, सर्पों तथा बिच्छुओंको आभूषणरूपमें धारण किये हुए हैं, पूर्णचन्द्रके समान उनका मुखमण्डल है, वे सौम्य स्वभाववाले हैं, करोड़ों चन्द्रमाके तुल्य कान्तिसे युक्त हैं, मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए हैं, शक्तिसहित सुशोभित हो रहे हैं, नीलवर्णवाले हैं, उनकी दाहिनी ओरकी आठ भुजाओंमें खड्ग-खेटक-पाश-रत्नमय अंकुश-नागकक्षा-शरासनयुक्त पाशुपतास्त्र-दण्ड और खट्वांग तथा बायीं ओरकी आठ भुजाओंमें तन्त्री-घण्टा-विशाल शूल-दिव्य डमरू-वज्र-गदा-टंक और प्रदीप्त मुद्गर हैं। वे वरेण्य परमेश्वर शेष दो हाथोंमें वरद और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये और अन्तमें अग्निमें हवन करना चाहिये॥ १३—२१॥
होमश्च पूर्ववत्सर्वो मन्त्रभेदश्च कीर्तितः।<br>अष्टपुष्पादि गन्धादि पूजास्तुतिनिवेदनम्॥ २२<br>अन्तर्बलिं च कुण्डस्य वाह्येयेन विधानतः।<br>मण्डलं विधिना कृत्वा मन्त्रैरेतैर्यथाक्रमम्॥ २३<br>रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो<br>राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः<br>क्षेत्रपालेभ्यः अथ वायुवरुणदिग्भागे क्षेत्रपालबलिं<br>क्षिपेत्॥<br>अर्घ्यं गन्धं पुष्पं च धूपं दीपं च सुव्रताः।<br>नैवेद्यं मुखवासादि निवेद्यं वै यथाविधि॥ २४<br>विज्ञाप्यैवं विसृज्याथ अष्टपुष्पैश्च पूजनम्।<br>सर्वसामान्यमेतद्धि पूजायां मुनिपुङ्गवाः॥ २५<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तमघोरार्चादि सुव्रत।<br>अघोरार्चाविधानं च लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा॥ २६<br>स्थण्डिलात्कोटिगुणितं लिङ्गार्चनमनुत्तमम्।<br>लिङ्गार्चनरतो विप्रो महापातकसम्भवैः॥ २७सम्पूर्ण होमकर्म पूर्ववत् होता है, केवल मन्त्रोंमें भेद कहा गया है। अष्टपुष्पांजलि, गन्ध, पुष्पके साथ पूजा, स्तुति, निवेदन तथा कुण्डकी अन्तर्बलि (होम) वह्निपुराणोक्त विधानसे करना चाहिये। पुनः विधिपूर्वक मण्डलकी रचना करके यथाक्रम रुद्रेभ्यो मातृगणेभ्यो यक्षेभ्योऽसुरेभ्यो ग्रहेभ्यो राक्षसेभ्यो नागेभ्यो नक्षत्रेभ्यो विश्वगणेभ्यः क्षेत्रपालेभ्यः [नमः]—इन मन्त्रोंका उच्चारण करके वायव्य तथा पश्चिम दिशामें क्षेत्रपालबलि प्रदान करनी चाहिये। [सूतजी बोले—] हे सुव्रतो! तदनन्तर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मुखवास आदि विधिपूर्वक निवेदित करना चाहिये। ये सब उपचार समर्पित करके अष्टपुष्पांजलियोंके द्वारा विसर्जनकर प्रार्थना करनी चाहिये। हे मुनिश्रेष्ठो! पूजामें यह सब सामान्य विधि है। [शैलादि बोले—] हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अघोरपूजनका विधान कहा है। शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें भी अघोरपूजनका विधान है, किंतु स्थण्डिलकी अपेक्षा लिङ्गमें पूजन करोड़ों गुना