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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 684 of 834

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Page 684
६८२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| अवयवव्याप्तिर्वक्त्रोद्घाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति<br>तृतीयेन गर्भजातकर्मपुरुषेण पूजनं तुरीयेण षष्ठेन<br>प्रोक्षणं सूतकशुद्धये चाग्निसूनुरक्षाकुशास्त्रेण वक्त्रे-<br>णाऽग्नौ मूलमीशाग्रं नैर्ऋतिमूलं वायव्याग्रं वायव्य-<br>मूलमीशाग्रमिति कुशास्तरणमिति पूर्वोक्तमिध्ममग्र-<br>मूलघृताक्तं लालापनोदाय षष्ठेन जुहुयात्॥ ७४ | अंगोंकी व्याप्ति, वक्त्रोद्घाटन और वक्त्रनिष्कृति तृतीय मन्त्रसे करना चाहिये। गर्भजातकर्म तत्पुरुषमन्त्रसे, पूजन चतुर्थ मन्त्रसे, सूतकशुद्धिके लिये प्रोक्षण षष्ठ मन्त्रसे और अग्निरूप पुत्रकी रक्षा कुशास्त्र मन्त्रसे करे। तत्पश्चात् वक्त्रमन्त्रसे अग्निकोणमें कुशमूल, ईशानमें कुशका अग्रभाग, नैर्ऋत्यमें कुशमूल, वायव्यमें अग्रभाग, वायव्यमें कुशमूल और ईशानमें अग्रभाग—इस भाँति पूर्वोक्त रीतिसे कुशास्तरण करके घृतमें भींगी हुई समिधाका अग्निकी लालानिवृत्तिके लिये षष्ठ मन्त्रसे हवन करना चाहिये॥ ७४॥ |
| पञ्चपूर्वातिक्रमेण परिधिविष्टरन्यासोऽपि आद्येन<br>विष्टरोपरि हिरण्यगर्भहरनारायणानपि पूजयेत्॥ ७५<br><br>इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत्॥ ७६<br><br>वज्रावर्तपर्यन्तानपि पूजयेत्॥ ७७<br><br>वागीश्वरवागीश्वरीपूजाद्येनमुद्रास्य हुतं विसर्ज-<br>येत्॥ ७८ | वामदेव आदि चार मन्त्रोंसे परिधियुक्त विष्टरका स्थापन करके आद्यमन्त्रसे विष्टरके ऊपर ब्रह्मा, शिव तथा नारायणका पूजन करना चाहिये। इसी प्रकार इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्रसे लेकर त्रिशूलपर्यन्त उनके आठ आयुधोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वागीश्वर तथा वागीश्वरीकी पूजा आदि करके इन वागीश्वरका उद्वासनकर होमद्रव्यका हवन करना चाहिये॥ ७५—७८॥ |
| स्रुक्स्रुवसंस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत् स्रुक् स्रुवं च हस्तद्वये गृहीत्वा<br>संस्थापनमाद्येन ताडनमपि स्रुक्स्रुवोपरि<br>दर्भानुलेखनमूलमध्यमाग्रेण त्रित्वेन स्रुक्शक्तिं<br>स्रुवमपि शम्भुं दक्षिणपार्श्वे कुशोपरि शक्तये नमः<br>शम्भवे नमः॥ ७९ | इसके पश्चात् स्रुक्-स्रुवका संस्कार बताया जाता है—पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करके दोनों हाथोंमें स्रुक्-स्रुव ग्रहणकर प्रथम मन्त्रसे संस्थापन तथा ताड़न करके स्रुक्-स्रुवके ऊपर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे तीन प्रकारसे अनुलेखन करके स्रुक्को शक्ति और स्रुवको शिव मानकर उन्हें दक्षिण भागमें कुशके ऊपर 'शक्तये नमः', 'शम्भवे नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा स्थापित करना चाहिये॥ ७९॥ |
| ततो ह्यन्तिसूत्रेण स्रुक्स्रुवौ तुरीयेण<br>वेष्टयेदर्चयेच्च॥ ८०<br><br>धेनुमुद्रां दर्शयित्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय स्रुक्स्रुवसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः॥ ८१ | तदनन्तर समीपवर्ती सूत्रसे स्रुक्-स्रुवको चतुर्थ मन्त्रका उच्चारण करके वेष्टित करना चाहिये और पुनः अर्चन करना चाहिये। इसके बाद धेनुमुद्रा दिखाकर चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षाकर्म सम्पन्न करके स्रुक्-स्रुव संस्कार करना चाहिये॥ ८०–८१॥ |
| पुनराज्यसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत्॥ ८२ | आज्यसंस्कार पूर्वमें बताया गया है, पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करना चाहिये। |
| आज्यप्रतापनमैशान्यां वा षष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य<br>घृतपात्रं वितस्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्ताङ्गुष्ठा- | इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे ईशानकोणमें घृतको तपाकर घृतपात्रको वेदीके ऊपर रखकर वितस्तिमात्र (बारह |