श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण-हवन-विधानका वर्णन ६८१
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डसंस्कारानन्तरमक्षपाटनं षष्ठेन विष्टरन्यासमाद्येन<br>वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम्॥ ६७<br><br>ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं<br>यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमा-<br>वाहयामि॥ ६८<br><br>ॐ वागीश्वरीं पूजयामि॥ ६९<br><br>ॐ पुनर्वागीश्वरावाहनम्॥ ७०<br><br>एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं<br>परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषित-<br>मावाहयामि॥ ७१<br><br>ॐ ईं वागीश्वराय नमः। आवाहनस्थापन-<br>सन्निधानसन्निरोधपूजान्तं वागीश्वरीं सम्भाव्य<br>गर्भाधानवह्निसंस्कारम्॥ ७२ | चाहिये॥ ६५-६६॥<br><br>कुण्डसंस्कारके पश्चात् षष्ठ मन्त्रसे अक्षपाटन और प्रथम मन्त्रसे विष्टरन्यास करके वज्रासन (हीरेके आसन)-पर भगवती वागीश्वरीका आवाहन करना चाहिये। [वागीश्वरीके आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—] ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमावाहयामि। वागीश्वरीं पूजयामि। इसके अनन्तर वागीश्वरका आवाहन करना चाहिये। [मन्त्र इस प्रकार है—] एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषितमावाहयामि। ॐ ईं वागीश्वराय नमः। इस प्रकार आवाहन, स्थापन, सन्निधान तथा सन्निरोध पूजापर्यन्त करके वागीश्वरीको सत्कृतकर गर्भाधान, वह्निसंस्कार करना चाहिये॥ ६७—७२॥ |
| अरणीजनितं कान्तोद्भवं वा अग्निहोत्रजं वा ताम्रपात्रे<br>शरावे वा आनीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालन-<br>माद्येन क्रव्यादाशिवपरित्यागोऽपि प्रथमेन<br>वह्नेस्त्रैकारणं जठरभ्रूमध्यादावाह्याग्निं<br>वैकारणामूर्तावाग्नेयेन उद्दीपनमाद्येन पुरुषेण संहितया<br>धारणा धेनुमुद्रां तुरीयेणावगुण्ठ्य जानुभ्यामवनिं<br>गत्वा शरावोत्थापनं कुण्डोपरि निधाय<br>प्रदक्षिणामावर्त्य तुरीयेणात्मसम्मुखां वागीश्वरीं<br>गर्भनाड्यां गर्भाधानान्तरीयेण कमलप्रदानमाद्येन<br>वौषडन्तेन कुशार्घ्यं दत्त्वा इन्धनप्रदानमाद्येन प्रज्वालनं<br>गर्भाधानं च सद्येनाद्येन पूजनं पुंसवनं वामेन पूजनं<br>द्वितीयेन सीमन्तोन्नयनमघोरेण तृतीयेन पूजनम्॥ ७३ | [संस्कारविधि इस प्रकार है—] अरणीसे उत्पन्न, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अथवा अग्निहोत्रसे उत्पन्न अग्निको ताम्रपात्र या मिट्टीके शराव (कसोरा)-में लाकर आद्यमन्त्रसे निरीक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण तथा प्रक्षालन करके पुनः आद्य मन्त्रसे ही क्रव्यादंश तथा अशिवका परित्यागकर जठर और भ्रूमध्यसे वह्निके त्रैकारण (त्रिवर्गसाधन)-का आवाहन करके उस आवाहित मूर्तिमें वह्निमन्त्रसे उद्दीपन करके तत्पुरुषमन्त्रसहित आद्यमन्त्रके द्वारा धारणा तथा संहितामन्त्रसे धेनुमुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। तत्पश्चात् चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करके दोनों घुटनोंको भूमिपर टेककर कसोरेको उठाकर कुण्डके ऊपर रखकर चतुर्थ मन्त्रसे प्रदक्षिणक्रमसे चारों ओर घुमाकर अपने सम्मुख विराजमान वागीश्वरीका ध्यान करके गर्भनालमें गर्भाधानकी रीतिसे वौषडन्त आद्यमन्त्रसे कमल प्रदान करके कुशार्घ्य देकर तथा प्रथम मन्त्रसे ईंधन देकर सद्योजातमन्त्रसे प्रज्वालन तथा गर्भाधान करना चाहिये। तदनन्तर प्रथम सद्योजातमन्त्रसे पूजन, वामदेवमन्त्रसे पुंसवन, उसी द्वितीय मन्त्रसे पुनः पूजन, अघोरमन्त्रसे सीमन्तोन्नयन और पुनः उसी तृतीय मन्त्रसे पूजन करना चाहिये॥ ७३॥ |