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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 654 of 834

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Page 654
६५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| योगिनां दर्शनाद्वापि स्पर्शनाद्भाषणादपि।<br>सद्यः सञ्जायते चाज्ञा पाशोपक्षयकारिणी॥ ४२<br><br>अथवा योगमार्गेण शिष्यदेहं प्रविश्य च।<br>बोधयेदेव योगेन सर्वतत्त्वानि शोध्य च॥ ४३<br><br>षडर्धशुद्धिर्विहिता ज्ञानयोगेन योगिनाम्।<br>शिष्यं परीक्ष्य धर्मज्ञं धार्मिकं वेदपारगम्॥ ४४<br><br>ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं बहुदोषविवर्जितम्।<br>ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य कर्णात्कर्णागतेन तु॥ ४५<br><br>दीपाद्दीपो यथा चान्यः सञ्चरेद्विधिवद्गुरुः।<br>भौवनं च पदं चैव वर्णाख्यं मात्रमुत्तमम्॥ ४६<br><br>कालाध्वरं महाभाग तत्त्वाख्यं सर्वसम्मतम्।<br>भिद्यते यस्य सामर्थ्यादाज्ञामात्रेण सर्वतः॥ ४७<br><br>तस्य सिद्धिश्च मुक्तिश्च गुरुकारुण्यसम्भवा।<br>पृथिव्यादीनि भूतानि आविशन्ति च भौवने॥ ४८<br><br>शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च भावतः।<br>पदं वर्णाख्यकं विप्र बुद्धीन्द्रियविकल्पनम्॥ ४९<br><br>कर्मेन्द्रियाणि मात्रं हि मनो बुद्धिरतः परम्।<br>अहङ्कारमथाव्यक्तं कालाध्वरमिति स्मृतम्॥ ५०<br><br>पुरुषादिविरिञ्च्यन्तमुन्मनत्वं परात्परम्।<br>तथेशत्वमिति प्रोक्तं सर्वतत्त्वार्थबोधकम्॥ ५१<br><br>अयोगी नैव जानाति तत्त्वशुद्धिं शिवात्मिकाम्॥ ५२ | शिलाको [नदी आदिसे] पार करा सकती है। जिनका नाममात्रका ज्ञान है, उनकी मुक्ति भी नाममात्रकी होती है॥ ३४-४१॥<br><br>योगियोंके दर्शन, स्पर्श तथा भाषणमात्रसे ही बन्धनका नाश करनेवाला अनुग्रह शीघ्र ही होता है। अथवा गुरुको योगमार्गसे शिष्यके देहमें प्रवेश करके योगके द्वारा सभी तत्त्वोंका शोधन करके शिष्यको ज्ञान प्रदान करना चाहिये। योगियोंके लिये ज्ञानयोगसे तीन गुणोंकी शुद्धि विहित है। गुरुको चाहिये कि धर्मको जाननेवाले, धर्मपरायण, वेदमें पारंगत तथा समस्त दोषोंसे रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य शिष्यकी सम्यक् परीक्षा करके ज्ञानसे ज्ञेयको देखकर गुरुपरम्परासे प्राप्त मार्गके द्वारा एक दीपकसे दूसरे दीपककी भाँति विधिपूर्वक उसे बोधमय करे॥ ४२-४५ १/२॥<br><br>भौवन, पद, वर्ण, मात्रा एवं कालाध्वरसंज्ञक—ये तत्त्व सर्वसम्मत एवं उत्तम हैं। हे महाभाग सनत्कुमार! गुरुके आज्ञामात्रके प्रभावसे जिस शिष्यकी इन तत्त्वोंकी संसारोन्मुखता नष्ट हो जाती है, उसी शिष्यको गुरुकारुण्यसमुत्पन्न सिद्धि और मुक्ति मिल जाती है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचमहाभूत भौवन पदवाच्य हैं अथवा इनका समावेश भौवनमें होता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये अपने स्वभावसे पद कहलाते हैं। हे विप्र! श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, घ्राण—ये पंचज्ञानेन्द्रियाँ वर्णसंज्ञक हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ मात्रसंज्ञक हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार—इस अन्तःकरण-चतुष्टयको कालाध्वर कहा गया है। मानवीय आनन्दसे लेकर ब्रह्मानन्दपर्यन्त [ब्रह्मापदपर्यन्त] उन्मनी अवस्था [अमनस्कत्व] श्रेष्ठसे श्रेष्ठतर है तथा सर्वतत्त्व-प्रकाशक ईशत्व इनसे भी श्रेष्ठ कहा गया है। इस कल्याणस्वरूपा तत्त्वशुद्धिको योगज्ञानशून्य प्राणी नहीं जानता है॥ ४६-५२॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवपूजनोपायवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘शिवपूजनोपायवर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥