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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 653 of 834

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Page 653

अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६५१


श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वद्वन्द्वसहा धीरा नित्यमुद्युक्तचेतसः ।<br>परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ २९<br><br>आर्जवा मार्दवाः स्वस्था अनुकूलाः प्रियंवदाः ।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्त्यक्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥ ३०<br><br>शौचाचारगुणोपेता दम्भमात्सर्यवर्जिताः ।<br>योग्या एवं द्विजाः सर्वे शिवभक्तिपरायणाः ॥ ३१<br><br>एवंवृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः ।<br>शोध्या एवंविधाश्चैव तत्त्वानां च विशुद्धये ॥ ३२<br><br>शुद्धो विनयसम्पन्नो मिथ्याकटुकवर्जितः ।<br>गुर्वाज्ञापालकश्चैव शिष्योऽनुग्रहमर्हति ॥ ३३[सुख-दुःख आदि] सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धैर्यशाली, सदा उद्योगशील चित्तवाले, परोपकारमें लगे रहनेवाले, गुरुसेवामें निरत, सरल तथा मृदु स्वभाववाले, स्वस्थचित्त, गुरुके अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले, मानरहित, बुद्धिसम्पन्न, स्पर्धाविहीन, कामनाशून्य, शौच-आचार आदि गुणोंसे युक्त, दम्भ तथा मात्सर्यसे विहीन—इस प्रकारके शिवभक्तिपरायण सभी द्विज शिष्य होनेके अधिकारी हैं। [इन्द्रिय आदि चौबीस] तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये मन-वाणी-कर्मसे इन आचरणोंसे सम्पन्न इस प्रकारके शिष्योंका शोधन करना चाहिये। शुद्ध हृदयवाले, विनयसे सम्पन्न, मिथ्या तथा कटुभाषणसे रहित और गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला शिष्य ही गुरुकृपाके योग्य होता है ॥ २६–३३ ॥
गुरुश्च शास्त्रवित्प्राज्ञस्तपस्वी जनवत्सलः ।<br>लोकाचाररतो ह्येवं तत्त्वविन्मोक्षदः स्मृतः ॥ ३४शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान्, तपस्वी, लोकप्रिय, लोकाचारमें रत तथा तत्त्वज्ञानी गुरु मोक्ष देनेमें समर्थ बताया गया है।
सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ।<br>सर्वोपायविधानज्ञस्तत्त्वहीनस्य निष्फलम् ॥ ३५गुरु सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त शास्त्रोंमें निष्णात तथा सभी उपायोंके विधानको जाननेवाला भी हो, किंतु यदि वह आत्मज्ञानसे रहित हो, तो सब कुछ निष्फल है।
स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि ।<br>आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥ ३६स्वयं अनुभूत किये जानेवाले परात्मतत्त्वमें जिसकी निश्चित धारणा न हो, उसका अपना ही कल्याण नहीं है, तो उसके द्वारा दूसरेका कल्याण कैसे सम्भव है ?
प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि ।<br>तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३७जो आत्मज्ञानी द्विज है, वह स्वयं शुद्ध है और दूसरोंको भी शुद्ध कर देता है। तत्त्वहीन गुरुमें बोध कहाँसे होगा और उसका आत्मोद्धार कैसे होगा!
परिग्रहविनिर्मुक्तास्ते सर्वे पशवोदिताः ।<br>पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥ ३८जो आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे सब पशु कहे गये हैं। पशुतुल्य द्विजके द्वारा जो शिष्य ज्ञानप्रेरित किये जाते हैं, वे सब भी पशु ही कहे गये हैं।
तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।<br>संवित्तिजननं तत्त्वं परानन्दसमुद्भवम् ॥ ३९अतः जो लोग तत्त्ववेत्ता हैं, वे ही मुक्त हैं और दूसरोंको भी मुक्त कर सकते हैं। आत्मबोध उत्पन्न करनेवाला तत्त्व परानन्दको उत्पन्न करता है।
तत्त्वं तु विदितं येन स एवानन्ददर्शकः ।<br>न पुनर्नाममात्रेण संवित्तिरहितस्तु यः ॥ ४०उस तत्त्वको जिसने जान लिया, वही परमानन्दका दर्शन करानेमें समर्थ है, नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता।
अन्योन्यं तारयेन्नैव किं शिला तारयेच्छिलाम् ।<br>येषां तन्नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ४१जो आत्मज्ञानविहीन है, वह दूसरेको कभी नहीं तार सकता, क्या [कोई] शिला दूसरी