श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ६४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उत्पन्न है तथा उत्पन्न होगा—वह सम्पूर्ण प्राणिसमुदायस्वरूप चौदह भुवन इन महारुद्रका ही स्वरूप है॥ २९-३०॥ | |
| हिरण्यबाहुर्भगवान् हिरण्यपतिरीश्वरः।<br>अम्बिकापतिरीशानो हेमेरेता वृषध्वजः॥ ३१<br><br>उमापतिर्विरूपाक्षो विश्वसृग्विश्ववाहनः।<br>ब्रह्माणं विदधे योऽसौ पुत्रमग्रे सनातनम्॥ ३२<br><br>प्रहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानमात्मप्रकाशकम्। | जो ये हिरण्यबाहु, भगवान्, हिरण्यपति, ईश्वर, अम्बिकापति, ईशान, हेमेरेता, वृषध्वज, उमापति, विरूपाक्ष, विश्वसृक् तथा विश्ववाहन संज्ञावाले शिव हैं, उन्होंने सबसे पहले सनातन ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और उन्हें आत्माको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान प्रदान किया॥ ३१-३२¹/₂॥ |
| तमेकं पुरुषं रुद्रं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ ३३<br><br>बालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये<br>विश्वं देवं वह्निरूपं वरेण्यम्।<br>तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३४ | जो धीर पुरुष उन अद्वितीय, पुरुष, बहुतोंके द्वारा आवाहन किये जानेवाले, बहुतोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, हृदयके मध्यमें बालके अग्रभागके समान सूक्ष्मरूपसे विराजमान, विश्वेश्वर देव, अग्निरूप तथा सर्वश्रेष्ठ रुद्रको अपनेमें स्थित देखते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य लोगोंको नहीं॥ ३३-३४॥ |
| महतो यो महीयांश्च ह्यणोरप्यणुरव्ययः।<br>गुहायां निहितश्चात्मा जन्तोरस्य महेश्वरः॥ ३५<br><br>वेश्मभूतोऽस्य विश्वस्य कमलस्थो हृदि स्वयं।<br>गह्वरं गहनं तत्स्थं तस्यान्तश्चोर्ध्वतः स्थितः॥ ३६<br><br>तत्रापि दहं गगनमोङ्कारं परमेश्वरम्।<br>बालाग्रमात्रं तन्मध्ये ऋतं परमकारणम्॥ ३७<br><br>सत्यं ब्रह्म महादेवं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्।<br>ऊर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमजोद्भवम्॥ ३८<br><br>अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः।<br>देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ ३९ | जो महान्से भी महान् हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं तथा अव्यय हैं, वे महेश्वर प्राणियोंकी हृदयरूपी गुहामें आत्मरूपसे स्थित हैं। कमलपर स्थित रहनेवाले वे शिव इस विश्वके आलयभूत होते हुए भी प्राणियोंके हृदयमें स्वयं विद्यमान रहते हैं और उस हृदयकमलमें स्थित जो अयोगियोंके लिये दुर्ज्ञेय हृदयाकाश है, उसके भीतर तथा बाहर अग्निशिखाकी भाँति विराजमान हैं। उस अग्निशिखामें भी बालाग्रके समान सूक्ष्म जो दहरसंज्ञक आकाश है, उसके मध्यमें ऋत, परमकारणरूप, सत्य, ब्रह्मरूप, महादेव, पुरुष, अर्धनारीश्वर, ऊर्ध्वरेता, ईशान, त्रिनेत्र तथा अजोद्भव परमेश्वर ओंकाररूपमें स्थित हैं। एक अथवा अनेक रूपोंवाले वे ईश्वर भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रवेश करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे अन्नमय आदि पंचविध देह ग्रहण करते हैं—उन पुरातन ईशानको जो धीर पुरुष देखते हैं, उन्हें शान्ति प्राप्त होती है॥ ३५-३९॥ |
| प्राणेष्वन्तर्मनसो लिङ्गमाहु-<br>र्यस्मिन् क्रोधो या च तृष्णा क्षमा च।<br>तृष्णां छित्त्वा हेतुजालस्य मूलं<br>बुद्ध्याचिन्त्यं स्थापयित्वा च रुद्रे॥ ४० | वे [शिव] प्राणोंके भीतर स्थित हैं। उन्हें मनका स्वरूप कहा गया है, जिसमें क्रोध, तृष्णा, क्षमा आदि विद्यमान रहते हैं। भवबन्धनके हेतुके मूल कारणभूत तृष्णाका छेदन करके उसे रुद्रमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उनका चिन्तन करना चाहिये॥ ४०॥ |