Skip to content
SarvaKosh
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 643 of 834

Read in context
Page 643

अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६४१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूक्ष्मो भूत्वा शरीराणि सर्वदा ह्यधितिष्ठति।<br>तस्मात्सूक्ष्मः समाख्यातो भगवान्नीललोहितः॥ १८<br><br>नीलश्च लोहितश्चैव प्रधानपुरुषान्वयात्।<br>स्कन्दतेऽस्य यतः शुक्रं तथा शुक्रमपैति च॥ १९सदा सूक्ष्मरूपसे सभी शरीरोंमें रहते हैं, अतः भगवान् नीललोहित सूक्ष्म कहलाते हैं। नील और लोहितरूप—प्रधान और पुरुषके संयोगसे इन सदाशिवका शुक्रांश स्कन्दित होता है और परम स्थानको प्राप्त होता है, अतः ये शुक्र कहे जाते हैं॥ १५—१९॥
विद्योतयति यस्तस्माद्वैद्युतः परिगीयते।<br>बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च बृहते च परापरे॥ २०<br><br>तस्माद्बृंहति यस्माद्धि परं ब्रह्मेति कीर्तितम्।<br>अद्वितीयोऽथ भगवांस्तुरीयः परमेश्वरः॥ २१ये दीप्ति प्रदान करते हैं, अतः वैद्युत कहे जाते हैं। ये [शिव] पर तथा अपर (ऐहिक तथा आमुष्मिक) रूपोंका वर्धन तथा पोषण करते हैं, अतः वर्धन तथा पोषणगुणयुक्त होनेके कारण परब्रह्म कहे गये हैं। ये भगवान् परमेश्वर [स्वजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदशून्य होनेके कारण] अद्वितीय (एक) हैं तथा तुरीय भी हैं॥ २०-२१॥
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशां चक्षुरीश्वरम्।<br>ईशानमिन्द्रसूरयः सर्वेषामपि सर्वदा॥ २२<br><br>ईशानः सर्वविद्यानां यत्तदीशान उच्यते।<br>यदीक्षते च भगवान्निरीक्ष्यमिति चाज्ञया॥ २३<br><br>आत्मज्ञानं महादेवो योगं गमयति स्वयम्।<br>भगवांश्चोच्यते देवो देवदेवो महेश्वरः॥ २४इन्द्र आदि प्रमुख देवता इन शिवको इस जगत्का स्वामी, देवताओंका चक्षुस्वरूप तथा सभीका नित्य नियन्ता कहते हैं। ये सभी विद्याओंके स्वामी हैं, अतः 'ईशान' कहे जाते हैं। वे देवदेव महेश्वर महादेव स्वेच्छासे सभी भावोंको देखते हैं, अपना अवबोध कराते हैं और स्वयं योगकी प्राप्ति कराते हैं, अतः वे भगवान् कहे जाते हैं॥ २२—२४॥
सर्वांल्लोकान् क्रमेणैव यो गृह्णाति महेश्वरः।<br>विसृजत्येष देवेशो वासयत्यपि लीलया॥ २५ये महेश्वर अपनी लीलासे ही क्रमसे सभी लोकोंको अपनेमें लीन करते हैं, उनकी सृष्टि करते हैं तथा उनका पालन भी करते हैं॥ २५॥
एषो हि देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः<br>पूर्वो हि जातः स उ गर्भे अन्तः।<br>स एव जातः स जनिष्यमाणः<br>प्रत्यङ्मुखास्तिष्ठति सर्वतोमुखः॥ २६ये ही शिव विश्वरूप होकर क्रीड़ा करते हुए सभी दिशाओंके रूपमें स्थित होते हैं। ये अनादिसिद्ध देव ब्रह्माण्डके उदरमें प्रविष्ट होकर स्वयं उत्पन्न होते हैं और आगे भी उत्पन्न होंगे। हे जीवो! ये सभी कालोंको व्याप्त करके स्थित रहते हैं॥ २६॥
उपासितव्यं यत्नेन तदेतत्सद्भिरव्ययम्।<br>यतो वाचो निवर्तन्ते ह्यप्राप्य मनसा सह॥ २७<br><br>तद्ग्रहणमेवेह यद्वाग्वदति यत्नतः।<br>अपरं च परं वेति परायणमिति स्वयम्॥ २८<br><br>वदन्ति वाचः सर्वज्ञं शङ्करं नीललोहितम्।<br>एष सर्वो नमस्तस्मै पुरुषः पिङ्गलः शिवः॥ २९अतएव सज्जनोंको इन अविनाशी प्रभुकी प्रयत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिये। इनका वर्णन करनेमें असमर्थ होनेके कारण तत्त्वनिरूपण किये बिना ही मनसहित वाणी लौट आती है। वाणी यत्नपूर्वक इनके विषयमें जो कुछ भी पर, अपर अथवा परायणरूपमें कहती है, वह उनका [वास्तविक] निर्वचन नहीं है। वाणी इन्हें सर्वज्ञ, शंकर तथा नीललोहित कहती है॥ २७-२८ १/२॥
स एष स महारुद्रो विश्वं भूतं भविष्यति।<br>भुवनं बहुधा जातं जायमानमितस्ततः॥ ३०ये सर्वस्वरूप, पुरुष, पिंगल तथा शिव हैं, इन्हें नमस्कार है। जो अनेक प्रकारसे उत्पन्न हो चुका है,