श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६३९
| गां गोभिर्ब्राह्मणान् सर्वान् ब्राह्मण्येन हवींषि च।<br>आयुषायुस्तथा सत्यं सत्येन सुरसत्तमाः ॥ २१<br>धर्मं धर्मेण सर्वांश्च तर्पयामि स्वतेजसा।<br>इत्यादौ भगवानुक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २२<br>नापश्यन्त ततो देवं रुद्रं परमकारणम्।<br>ते देवाः परमात्मानं रुद्रं ध्यायन्ति शङ्करम् ॥ २३<br>सनारायणका देवाः सेन्द्राश्च मुनयस्तथा।<br>तथोध्र्वबाहवो देवा रुद्रं स्तुवन्ति शङ्करम् ॥ २४ | हे श्रेष्ठ देवगण ! मैं वाणीको वेदोंसे, सभी ब्राह्मणों तथा हवियोंको ब्राह्मण्यसे, आयुको आयुसे, सत्यको सत्यसे, धर्मको धर्मसे और अन्य सबको अपने तेजसे तृप्त करता हूँ—ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर जब उन देवताओंने परमकारणरूप रुद्रको नहीं देखा, तब वे उन परमात्मा शंकरका ध्यान करने लगे। नारायण विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता और मुनिगण ऊपरकी ओर हाथ उठाकर कल्याणकारी रुद्रकी स्तुति करने लगे ॥ २१–२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवमाहात्म्यवर्णन' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय
देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति
| देवा ऊचुः | देवता बोले— |
|---|---|
| य एष भगवान् रुद्रो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>स्कन्दश्चापि तथा चेन्द्रो भुवनानि चतुर्दश।<br>अश्विनौ ग्रहताराश्च नक्षत्राणि च खं दिशः ॥ १<br>भूतानि च तथा सूर्यः सोमश्चाष्टौ ग्रहास्तथा।<br>प्राणः कालो यमो मृत्युरमृतः परमेश्वरः ॥ २<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च वर्तमानं महेश्वरः।<br>विश्वं कृत्स्नं जगत्सर्वं सत्यं तस्मै नमो नमः ॥ ३ | जो ये भगवान् रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, कार्तिकेय, इन्द्र, चौदहों भुवन, दोनों अश्विनीकुमार, सभी ग्रह, तारा, नक्षत्र, आकाश तथा दिशाएँ हैं। समस्त प्राणी, सूर्य, चन्द्रमा, आठों ग्रह, प्राण, काल, यम, मृत्यु तथा मोक्षरूप वे परमेश्वर ही हैं। पूर्वकालिक विश्व, उत्पद्यमान सम्पूर्ण संसार, आगे होनेवाले जगत् और वर्तमानकालिक सभी पदार्थ—ये सब वास्तवमें महेश्वर ही हैं। उन्हें बार-बार नमस्कार है ॥ १–३ ॥ |
| त्वमादौ च तथा भूतो भूर्भुवः स्वस्तथैव च।<br>अन्ते त्वं विश्वरूपोऽसि शीर्षं तु जगतः सदा ॥ ४<br>ब्रह्मैकस्त्वं द्वित्रिधार्थमधश्च त्वं सुरेश्वरः।<br>शान्तिश्च त्वं तथा पुष्टिस्तुष्टिश्चाप्यहुतं हुतम् ॥ ५<br>विश्वं चैव तथाविश्वं दत्तं वादत्तमेश्वरम्।<br>कृतं चाप्यकृतं देवं परमप्यपरं ध्रुवम्।<br>परायणं सतां चैव ह्यसतामपि शङ्करम् ॥ ६ | आदि तथा अन्तमें आप ही प्रादुर्भूत हुए। आप भूर्भुवः स्वः (तीनों व्याहृतियाँ)-स्वरूप हैं। आप विश्वरूप हैं तथा सदा जगत्के शीर्ष हैं। आप अद्वितीय हैं, आप प्रकृतिपुरुष द्विधारूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिधारूप ब्रह्म हैं। आप सबके आधार तथा देवताओंके ईश्वर हैं। शान्ति, पुष्टि तथा तुष्टि आप ही हैं। हुत, अहुत, विश्व, अविश्व, दत्त, अदत्त, कृत, अकृत, पर, अपर, प्रभु, ईश्वर आप ही हैं। आप शंकर ही साधुओं तथा असाधुओंके आश्रयरूप ब्रह्म हैं ॥ ४–६ ॥ |
| अपामसोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्।<br>किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृतं मर्त्यस्य ॥ ७ | हम उमासहित सदाशिवके सौन्दर्यामृतका अपने |