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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 640 of 834

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Page 640

६३८ ·श्रीलिङ्गमहापुराण· [ उत्तरभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपहृत्य च विज्ञानमेषामेव महेश्वरः।<br>देवा ह्यपृच्छंस्तं देवं को भवानिति शङ्करम्॥ ९<br><br>अब्रवीद्भगवान् रुद्रो ह्यहमेकः पुरातनः।<br>आसं प्रथम एवाहं वर्तामि च सुरोत्तमाः॥ १०<br><br>भविष्यामि च लोकेऽस्मिन् मत्तो नान्यः कुतश्चन।<br>व्यतिरिक्तं न मत्तोऽस्ति नान्यत्किञ्चित्सुरोत्तमाः॥ ११तत्पश्चात् देवताओंने भगवान् शंकरसे पूछा—आप कौन हैं? तब भगवान् रुद्रने कहा—हे श्रेष्ठ देवगण! मैं एक पुरातन पुरुष हूँ। सर्वप्रथम मैं ही था, अब भी हूँ और भविष्यमें भी रहूँगा, इस लोकमें मुझसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! अन्य कुछ भी मुझसे भिन्न नहीं है॥ ८–११॥
नित्योऽनित्योऽहमनघो ब्रह्माहं ब्रह्मणस्पतिः।<br>दिशश्च विदिशश्चाहं प्रकृतिश्च पुमानहम्॥ १२<br><br>त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप् च च्छन्दोऽहं तन्मयः शिवः।<br>सत्योऽहं सर्वगः शान्तस्त्रेताग्निर्गौरवं गुरुः॥ १३<br><br>गौरहं गह्वरश्चाहं नित्यं गहनगोचरः।<br>ज्येष्ठोऽहं सर्वतत्त्वानां वरिष्ठोऽहमपां पतिः॥ १४मैं नित्य हूँ तथा अनित्य भी हूँ। मैं पापशून्य, ब्रह्मा तथा ब्रह्मणस्पति (वेदोंका पालक) हूँ। मैं [पूर्व आदि] दिशाएँ तथा [आग्नेय आदि] विदिशाएँ भी हूँ। मैं प्रकृति हूँ और पुरुष भी हूँ। मैं त्रिष्टुप्, जगती और अनुष्टुप् छन्द हूँ, मैं छन्दराशिसे परिपूर्ण हूँ। मैं कल्याणस्वरूप, सत्यरूप, सर्वगामी, शान्त, त्रेताग्नि (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय)-रूप गौरव और हितोपदेशक हूँ। मैं पृथ्‍वीरूप हूँ। मैं गह्वर (गुहारूप) तथा आनन्दवन आदिमें सदा प्रत्यक्ष रहनेवाला हूँ। मैं समस्त तत्त्वोंमें ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ हूँ, मैं समुद्ररूप हूँ॥ १२–१४॥
आपोऽहं भगवानीशस्तेजोऽहं वेदिरप्यहम्।<br>ऋग्वेदोऽहं यजुर्वेदः सामवेदोऽहमात्मभूः॥ १५<br><br>अथर्वणोऽहं मन्त्रोऽहं तथा चाङ्गिरसां वरः।<br>इतिहासपुराणानि कल्पोऽहं कल्पनाप्यहम्॥ १६<br><br>अक्षरं च क्षरं चाहं क्षान्तिः शान्तिरहं क्षमा।<br>गुह्योऽहं सर्ववेदेषु वरेण्योऽहमजोऽप्यहम्॥ १७भगवान् शिव कहते हैं—मैं जल हूँ, मैं तेज हूँ और मैं परिष्कृत यज्ञभूमिरूप भी हूँ। मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद हूँ। मैं आकाशरूप हूँ। मैं अंगिरसोंमें श्रेष्ठ अथर्वणमन्त्र (चतुर्थ वेदरूप) हूँ। मैं [महाभारत आदि] इतिहास, पुराण तथा कल्प (कर्मप्रयोगरचना) हूँ। मैं कल्पना भी हूँ। मैं अक्षर (कूटस्थरूप) तथा क्षर (नाशवान्) हूँ। मैं क्षान्ति (धैर्य), शान्ति तथा क्षमा हूँ। मैं सभी वेदोंमें गुह्य (संवृतरूप) हूँ। मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ। मैं अजन्मा भी हूँ॥ १५–१७॥
पुष्करं च पवित्रं च मध्यं चाहं ततः परम्।<br>बहिश्चाहं तथा चान्तःपुरस्तादहमव्ययः॥ १८<br><br>ज्योतिश्चाहं तमश्चाहं ब्रह्माविष्णुर्महेश्वरः।<br>बुद्धिश्चाहमहङ्कारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १९<br><br>एवं सर्वं च मामेव यो वेद सुरसत्तमाः।<br>स एव सर्ववित्सर्वं सर्वात्मा परमेश्वरः॥ २०मैं पवित्र हृदयकमलरूप हूँ, मैं उसका मध्यभाग हूँ तथा उससे पर भी हूँ। मैं बाहर हूँ, भीतर हूँ तथा समक्ष भी हूँ। मैं शाश्वत हूँ। मैं ज्योति हूँ तथा अन्धकार भी हूँ। मैं ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हूँ। बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ तथा इन्द्रियाँ मैं ही हूँ। हे श्रेष्ठ देवगण! इस प्रकार जो मुझ विश्वरूपको जानता है, वही सर्वज्ञ है, सर्वात्मा है और वह परमेश्वररूप हो जाता है॥ १८–२०॥
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