श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ६३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अन्तर्यामी परः कैश्चित्कैश्चिदीशः प्रकीर्त्यते।<br>स्वयंज्योतिः स्वयंवेद्यः शिवः शम्भुर्महेश्वरः॥ १४<br>सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामी शिवः स्मृतः।<br>सर्वेषामेव भूतानां परत्वात्पर उच्यते॥ १५ | कोई-कोई लोग स्वयंज्योतिरूप तथा स्वयंवेद्य ईश परमेश्वर शंकर शम्भुको अन्तर्यामी तथा पर कहते हैं। वे शिव सम्पूर्ण प्राणियोंमें विराजमान हैं, अतः अन्तर्यामी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ होनेके कारण वे परमात्मा परमेश्वर शम्भु शंकर शिव 'पर' कहे जाते हैं॥ १४-१५ १/२ ॥ |
| परमात्मा शिवः शम्भुः शङ्करः परमेश्वरः।<br>प्राज्ञतैजसविश्वाख्यं तस्य रूपत्रयं विदुः॥ १६<br>सुषुप्ति स्वप्नजाग्रन्तमवस्थात्रयमेव तत्।<br>विराट् हिरण्यगर्भाख्यमव्याकृतपदाह्वयम्॥ १७<br>तुरीयस्य शिवस्यास्य अवस्थात्रयगामिनः।<br>हिरण्यगर्भः पुरुषः काल इत्येव कीर्तिताः॥ १८<br>तिस्रोऽवस्था जगत्सृष्टिस्थितिसंहारहेतवः।<br>भवविष्णुविरिञ्चाख्यमवस्थात्रयमीशितुः॥ १९<br>आराध्य भक्त्या मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति शरीरिणः। | प्राज्ञ, तैजस और विश्व नामक उनके तीन रूप कहे गये हैं। इन्हें ही सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत्—तीन अवस्थाएँ भी कहते हैं और ये ही विराट्, हिरण्यगर्भ और अव्याकृत पदके भी वाचक हैं। तीनों अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले उन तुरीयस्वरूप शिवके हिरण्यगर्भ, पुरुष और काल—ये तीनों ही जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहारकी कारणरूपा तीन अवस्थाएँ कही गयी हैं। भव, विष्णु, विरिंचि (ब्रह्मा) नामक तीनों अवस्थाएँ महेश्वरकी ही हैं; भक्तिपूर्वक इनकी आराधना करके प्राणी मुक्ति प्राप्त करते हैं॥ १६-१९ १/२ ॥ |
| कर्ता क्रिया च कार्यं च करणं चेति सूरिभिः॥ २०<br>शम्भोश्चत्वारि रूपाणि कीर्त्यन्ते परमेष्ठिनः।<br>प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं प्रमितिस्तथा॥ २१<br>चत्वार्येतानि रूपाणि शिवस्यैव न संशयः।<br>ईश्वराव्याकृतप्राणविराड्भूतेन्द्रियात्मकम् ॥ २२<br>शिवस्यैव विकारोऽयं समुद्रस्येव वीचयः। | कर्ता, क्रिया, कार्य तथा करण—ये विद्वानोंके द्वारा परमेष्ठी शिवके चार रूप कहे गये हैं। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तथा प्रमिति—ये चारों भी शिवके ही रूप हैं; इसमें संशय नहीं है। ईश्वर, अव्याकृत, प्राण, विराट्, भूत, इन्द्रिय और आत्मा—ये सब समुद्रकी तरंगोंकी भाँति शिवके ही विकार हैं॥ २०-२२ १/२ ॥ |
| ईश्वरं जगतामाहुर्निमित्तं कारणं तथा॥ २३<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तदुक्तं वेदवादिभिः।<br>हिरण्यगर्भः प्राणाख्यो विराट् लोकात्मकः स्मृतः॥ २४<br>महाभूतानि भूतानि कार्याणि इन्द्रियाणि च।<br>शिवस्यैतानि रूपाणि शंसन्ति मुनिसत्तमाः॥ २५ | ईश्वरको जगत्का निमित्त कारण कहा गया है। वेदवेत्ताओंने अव्याकृतको प्रधान कहा है। हिरण्यगर्भको ही प्राण नामवाला तथा विराट्को लोकरूप कहा गया है। महाभूत, भूत, कार्य तथा इन्द्रियाँ—श्रेष्ठ मुनिगण इन्हें शिवके रूप कहते हैं॥ २३-२५॥ |
| परमात्मा शिवादन्यो नास्तीति कवयो विदुः।<br>शिवजातानि तत्त्वानि पञ्चविंशन्मनीषिभिः॥ २६<br>उक्तानि न तदन्यानि सलिलादूर्भिवृन्दवत्।<br>पञ्चविंशत्पदार्थेभ्यः शिवतत्त्वं परं विदुः॥ २७<br>तानि तस्मादनन्यानि सुवर्णकटकादिवत्।<br>सदाशिवेश्वराद्यानि तत्त्वानि शिवतत्त्वतः॥ २८ | परमात्मा शिवसे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है—ऐसा कवियोंने कहा है। मनीषियोंने [समस्त] पचीस तत्त्वोंको शिवसे ही उत्पन्न बताया है, वे जलसे तरंगकी भाँति उन [शिव]-से अभिन्न हैं। किंतु शिवतत्त्वको पचीस तत्त्वोंसे भी पर कहा गया है। वे [सब तत्त्व] सुवर्णसे कुण्डल आदिकी तरह उनसे अभिन्न हैं। सदाशिव आदि सगुण तत्त्व भी उन्हीं शिवतत्त्वसे |