श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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अध्याय १६ ] | विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा | ६३५
सोलहवाँ अध्याय
विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>पुनरेव महाबुद्धे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ १ | सनत्कुमार बोले—हे महाबुद्धे! मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंमें अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंको मैं यथार्थ रूपमें पुनः सुनना चाहता हूँ॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>पुनः पुनः प्रवक्ष्यामि शिवरूपाणि ते मुने।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ २ | शैलादि बोले—हे मुने! मैं मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंसे अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंका वर्णन आपसे पुनः-पुनः करूँगा॥ २॥ |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्व्यक्तं कालात्मेति मुनीश्वरैः।<br>उच्यते कैश्चिदाचार्यैरागमार्णवपारगैः॥ ३ | वेदरूपी समुद्रके पारगामी कुछ आचार्य तथा मुनीश्वर उन शिवको क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, व्यक्त तथा कालात्मा—ऐसा कहते हैं॥ ३॥ |
| क्षेत्रज्ञं पुरुषं प्राहुः प्रधानं प्रकृतिं बुधाः।<br>विकारजातं निःशेषं प्रकृतेर्व्यक्तमित्यपि॥ ४<br>प्रधानव्यक्तयोः कालः परिणामैककारणम्।<br>तच्चतुष्टयमीशस्य रूपाणां हि चतुष्टयम्॥ ५ | विद्वज्जनोंने पुरुषको क्षेत्रज्ञ, प्रधानको प्रकृति और प्रकृतिके सम्पूर्ण विकारसमूहको व्यक्त कहा है; प्रधान तथा व्यक्तके विस्तारमें एकमात्र कारण काल ही है। ये चारों ही ईश्वरके रूपचतुष्टय हैं॥ ४-५॥ |
| हिरण्यगर्भं पुरुषं प्रधानं व्यक्तरूपिणम्।<br>कथयन्ति शिवं केचिदाचार्याः परमेश्वरम्॥ ६<br>हिरण्यगर्भः कर्तास्य भोक्ता विश्वस्य पूरुषः।<br>विकारजातं व्यक्ताख्यं प्रधानं कारणं परम्॥ ७<br>तेषां चतुष्टयं बुद्धेः शिवरूपचतुष्टयम्।<br>प्रोच्यते शङ्करादन्यदस्ति वस्तु न किञ्चन॥ ८ | कुछ आचार्य परमेश्वर शिवको हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान तथा व्यक्तरूपवाला भी कहते हैं। इस जगत्का कर्ता हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) है, भोक्ता पुरुष (विष्णु) है, समस्त प्रपंच 'व्यक्त' नामवाला है और मुख्य कारण प्रधान है। उन हिरण्यगर्भ आदिका तथा बुद्धि आदिका चतुष्टय भगवान् शिवका रूपचतुष्टय कहा जाता है, शंकरसे भिन्न अन्य कोई भी वस्तु नहीं है॥ ६–८॥ |
| पिण्डजातिस्वरूपी तु कथ्यते कैश्चिदीश्वरः।<br>चराचरशरीराणि पिण्डाख्यान्यखिलान्यपि॥ ९<br>सामान्यानि समस्तानि महासामान्यमेव च।<br>कथ्यन्ते जातिशब्देन तानि रूपाणि धीमतः॥ १० | कुछ लोग ईश्वर शिवको पिण्ड तथा जातिरूपवाला कहते हैं। चर तथा अचर समस्त शरीर ही पिण्डपदवाच्य है। उन बुद्धिसम्पन्न शिवके वे जाति, व्यक्ति और द्रव्योंके समस्त रूप ही जातिशब्दवाच्य हैं॥ ९-१०॥ |
| विराट् हिरण्यगर्भात्मा कैश्चिदीशो निगद्यते।<br>हिरण्यगर्भो लोकानां हेतुर्लोकात्मको विराट्॥ ११<br>सूत्राव्याकृतरूपं तं शिवं शंसन्ति केचन।<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तद्रूपं परमेष्ठिनः॥ १२<br>लोका येनैव तिष्ठन्ति सूत्रे मणिगणा इव।<br>तत्सूत्रमिति विज्ञेयं रूपमद्भुतविक्रमम्॥ १३ | कुछ लोग शिवको विराट् तथा हिरण्यगर्भरूप कहते हैं। हिरण्यगर्भ समस्त लोकोंका कारण है और विराट् लोकस्वरूप है। कुछ लोग उन शिवको सूत्राव्याकृतरूप कहते हैं। परमेष्ठी शिवका वह रूप अव्याकृत तथा प्रधान है। समस्त लोक उनमें उसी भाँति ओतप्रोत हैं, जैसे सूत्रमें मणियाँ, अतः उनके अद्भुत पराक्रमी स्वरूपको सूत्ररूप समझना चाहिये॥ ११–१३॥ |