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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 603 of 834

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Page 603
अध्याय ६ ]भगवान् विष्णुसे अलक्ष्मी (ज्येष्ठा—दरिद्रा) तथा लक्ष्मीका प्रादुर्भाव६०१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अग्निहोत्रं गृहे येषां लिङ्गार्चा वा गृहेषु च।<br>वासुदेवतनुर्वापि चण्डिका यत्र तिष्ठति ॥ २७<br>दूरतो व्रज तान् हित्वा सर्वपापविवर्जितान्।<br>नित्यनैमित्तिकैर्यज्ञैर्यजन्ति च महेश्वरम् ॥ २८<br>तान् हित्वा व्रज चान्यत्र दुःसह त्वं सहानया।<br>श्रोत्रिया ब्राह्मणा गावो गुरवोऽतिथयः सदा ॥ २९<br>रुद्रभक्ताश्च पूज्यन्ते यैर्नित्यं तान् विवर्जयेत्।जिनके घरमें अग्निहोत्र तथा शिवलिङ्गका पूजन होता हो और जिनके घरोंमें वासुदेव तथा भगवती चण्डिकाकी मूर्ति विराजमान हो, समस्त पापोंसे रहित उन लोगोंको छोड़कर दूर चले जाना। हे दुःसह! जो लोग नित्य तथा नैमित्तिक यज्ञोंके द्वारा महेश्वरकी आराधना करते हैं, उन्हें छोड़कर तुम इसके साथ अन्यत्र चले जाना। जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तोंकी नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना॥ २७-२९ १/२ ॥
दुःसह उवाच<br>यस्मिन् प्रवेशो योग्यो मे तद्ब्रूहि मुनिसत्तम ॥ ३०<br>त्वद्वाक्याद्भयनिर्मुक्तो विशान्येषां गृहे सदा।दुःसह बोला—हे मुनिश्रेष्ठ! जिस स्थानमें मेरा प्रवेश हो सके; उसे आप मुझे बतायें, जिससे आपके वचनसे मैं भयरहित होकर इनके घरमें सदा प्रवेश करूँ॥ ३० १/२ ॥
मार्कण्डेय उवाच<br>न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा।<br>यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनी ॥ ३१<br>सभार्यस्त्वं गृहं तस्य विशेथा भयवर्जितः।<br>देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ३२<br>विनिन्द्यो यत्र भगवान् विशस्व भयवर्जितः।<br>वासुदेवरतिर्नास्ति यत्र नास्ति सदाशिवः ॥ ३३<br>जपहोमादिकं नास्ति भस्म नास्ति गृहे नृणाम्।<br>पर्वण्यभ्यर्चनं नास्ति चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ ३४<br>कृष्णाष्टम्यां च रुद्रस्य सन्ध्यायां भस्मवर्जिताः।<br>चतुर्दश्यां महादेवं न यजन्ति च यत्र वै॥ ३५<br>विष्णोर्नामविहीना ये सङ्गताश्च दुरात्मभिः।<br>नमः कृष्णाय शर्वाय शिवाय परमेष्ठिने ॥ ३६<br>ब्राह्मणाश्च नरा मूढा न वदन्ति दुरात्मकाः।<br>तत्रैव सततं वत्स सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३७मार्कण्डेयजी बोले—जिसके घरमें वैदिकों, द्विजों, गौओं, गुरुओं तथा अतिथियोंकी पूजा न होती हो और जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरेके विरोधी हों, उसके घरमें तुम निर्भय होकर अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो। जहाँपर देवाधिदेव, महादेव तथा तीनों भुवनोंके स्वामी भगवान् रुद्रकी निन्दा होती हो, वहाँ तुम भयरहित होकर प्रवेश करो ॥ ३१-३२ १/२ ॥<br>जहाँ भगवान् वासुदेवके प्रति भक्ति न हो; जहाँ सदाशिव न स्थापित हों; जहाँ मनुष्योंके घरमें जप-होम आदि न होता हो, भस्म-धारण न किया जाता हो, पर्वपर विशेष करके चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी तिथिपर रुद्रपूजन न होता हो, लोग सन्ध्योपासनके समय भस्मधारण न करते हों; जहाँपर लोग चतुर्दशीके दिन महादेवका यजन न करते हों; जहाँ लोग विष्णुके नाम-संकीर्तनसे विमुख हों; जहाँ लोग दुष्टात्मावाले पुरुषोंके साथ रहते हों; जहाँ ब्राह्मण तथा विकृत मनवाले मनुष्य ‘कृष्णको नमस्कार है, परमेष्ठी शर्वको नमस्कार है’— ऐसा नहीं कहते हों, वहींपर तुम अपनी भार्याके साथ सदा प्रवेश करो॥ ३३-३७॥
वेदघोषो न यत्रास्ति गुरुपूजादयो न च।<br>पितृकर्मविहीनांस्तु सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३८जहाँ वेदध्वनि, गुरुपूजा आदि न होते हों, उन स्थानोंपर और पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-से विमुख लोगोंके यहाँ अपनी भार्यासहित निवास करो।