श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| ६०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| तया सह वनं गत्वा चचार स महामुनिः।<br>तपो महद्घने घोरे याति कन्या प्रतिग्रहम् ॥ १२<br>न करिष्यामि चेत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तामृषिः।<br>योगज्ञानपरः शुद्धो यत्र योगीश्वरो मुनिः ॥ १३<br>तत्रायान्तं महात्मानं मार्कण्डेयमपश्यत।<br>प्रणिपत्य महात्मानं दुःसहो मुनिमब्रवीत् ॥ १४<br>भार्यैयं भगवन् मह्यं न स्थास्यति कथञ्चन।<br>किं करोमीति विप्रर्षे ह्यनया सह भार्यया ॥ १५<br>प्रविशामि तथा कुत्र कुतो न प्रविशाम्यहम्। | इसके बाद वे महामुनि उसके साथ घोर वनमें जाकर कठोर तप करने लगे। वे सोचने लगे कि कन्याका प्रतिग्रह भविष्यमें नहीं करूँगा—ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे ऋषि योगज्ञानपरायण हो गये। [किसी समय] उन विशुद्धात्मा योगीश्वर मुनिने वहाँपर आते हुए मार्कण्डेयजीको देखा। उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके ऋषि दुःसहने कहा—हे भगवन्! मेरी यह भार्या मेरे साथ कभी नहीं रहेगी। हे विप्रर्षे! मैं क्या करूँ; अपनी इस भार्याके साथ कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ? ॥ १२—१५१/२ ॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु दुःसह सर्वत्र अकीर्तिरशुभान्विता ॥ १६<br>अलक्ष्मीरतुला चेयं ज्येष्ठा इत्यभिशब्दिता। | मार्कण्डेयजी बोले—हे दुःसह! सुनो, अकीर्ति सर्वत्र अशुभसे युक्त रहती है; यह अतुलनीय अलक्ष्मी ‘ज्येष्ठा’—इस नामसे पुकारी जाती है॥ १६१/२॥ |
| नारायणपरा यत्र वेदमार्गानुसारिणः ॥ १७<br>रुद्रभक्ता महात्मानो भस्मोद्धूलितविग्रहाः।<br>स्थिता यत्र जना नित्यं मा विशेथाः कथञ्चन ॥ १८<br>नारायण हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।<br>अच्युतानन्त गोविन्द वासुदेव जनार्दन ॥ १९<br>रुद्र रुद्रेति रुद्रेति शिवाय च नमो नमः।<br>नमः शिवतरायेति शङ्करायेति सर्वदा ॥ २०<br>महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत्।<br>उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा ॥ २१<br>हिरण्यबाहवे तुभ्यं वृषाङ्काय नमो नमः।<br>नृसिंह वामनाचिन्त्य माधवेति च ये जनाः ॥ २२<br>वक्ष्यन्ति सततं हृष्टा ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।<br>वैश्याः शूद्राश्च ये नित्यं तेषां धनगृहादिषु।<br>आरामे चैव गोष्ठेषु न विशेथाः कथञ्चन ॥ २३<br>ज्वालामालाकरालं च सहस्त्रादित्यसन्निभम्।<br>चक्रं विष्णोरतीवोग्रं तेषां हन्ति सदाशुभम् ॥ २४ | जहाँ नारायणके भक्त, वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले, रुद्रभक्त, महात्मागण तथा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले लोग सदा रहते हों, वहाँ तुम कभी भी प्रवेश मत करना। ‘हे नारायण! हे हृषीकेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे माधव! हे अच्युतानन्त! हे गोविन्द! हे वासुदेव! हे जनार्दन! हे रुद्र! हे रुद्र! हे रुद्र!’ शिवको बार-बार नमस्कार है, शिवतरको नमस्कार है, शंकरको सर्वदा नमस्कार है, हे महादेव! हे महादेव! हे महादेव!—ऐसा कहते रहनेवाले; आप उमापति, हिरण्यपति, हिरण्यबाहु तथा वृषांकको सदा बार-बार नमस्कार है, हे नृसिंह! हे वामन! हे अचिन्त्य! हे माधव!—ऐसा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रसन्न होकर नित्य बोलते रहते हैं; उनके धन-आदि गृहोंमें, उद्यानमें तथा गोष्ठोंमें कभी भी प्रवेश मत करना; क्योंकि विकराल अग्नि-ज्वालाओं तथा हजारों सूर्योंके समान तेजोमय अत्यन्त उग्र विष्णुचक्र उन लोगोंके अमंगलका सदा नाश कर देता है॥ १७—२४॥ |
| स्वाहाकारो वषट्कारो गृहे यस्मिन् हि वर्तते।<br>तद्धित्वा चान्यमागच्छ सामघोषोऽथ यत्र वा ॥ २५<br>वेदाभ्यासरता नित्यं नित्यकर्मपरायणाः।<br>वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान् विसर्जयेत् ॥ २६ | जिस घरमें स्वाहाकार तथा वषट्कार होता हो तथा जहाँपर सामवेदकी ध्वनि होती हो, उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाना। जो लोग नित्य वेदाभ्यासमें संलग्न हों, नित्यकर्ममें तत्पर हों तथा वासुदेवकी पूजामें रत हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना॥ २५-२६॥ |