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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

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DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

यह ग्रन्थ काश्मीर शैव दर्शन की स्पन्दकारिका को उसकी चार प्रमुख प्राचीन टीकाओं के प्रकाश में प्रस्तुत करता है। मुखपृष्ठ के अनुसार इसमें भट्ट कल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति', आचार्य क्षेमराज के 'स्पन्दनिर्णय', उत्पलाचार्य की 'स्पन्दप्रदीपिका' और रामकण्ठ की 'स्पन्दकारिकाविवृति' का निष्कर्ष लेकर 'सरोजिनी' नामक हिन्दी व्याख्या लिखी गई है। व्याख्याकार डॉ. श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द' हैं, और यह चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी से चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला के ३७०वें पुष्प के रूप में २००४ में प्रथम बार छपा।

क्षेमराज, अभिनवगुप्त के शिष्य थे और उनका 'स्पन्दनिर्णय' कारिकाओं को प्रत्यभिज्ञा दर्शन के अनुरूप पढ़ता है। पुस्तक की भूमिका स्पन्द-दर्शन का परिचय देती है। इसके बाद कारिकाएँ निःष्यन्दों के क्रम में आती हैं, जैसे:

  • प्रथम निःष्यन्द: स्वरूप-स्पन्द, उन्मेष-निमेष और चिति का स्पन्दन
  • द्वितीय निःष्यन्द: सहज-विद्या का उदय, नाड़ी-संहार और बिन्दु-नाद का रहस्य

लगभग ५१९ पृष्ठों का यह संस्करण उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो एक ही स्थान पर विभिन्न टीकाकारों के मत की तुलना करते हुए स्पन्द-शास्त्र पढ़ना चाहते हैं।