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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 513 of 519

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Page 513

४१२ स्पन्दकारिका
'नारद संग्रह' में भी कहा गया है—संसार का मूलोच्छेद करने वाले गुरु को
अपने सर्वस्व की दक्षिणा दे देना भी बहुत थोड़ा है'—
'गुरवे दक्षिणां दद्यात् सर्वस्वं सार्थमेव वा ।
सर्वस्वमथवाऽत्यल्पं संसारोच्छेदहेतवे ॥'
'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा गया है—जिसके मन में भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा हो,
उसे पहले गुरु का अन्वेषण करना चाहिए ।' भगवान् की पहचान होती है—शास्त्र से
और शास्त्र का अनुभवात्मक ज्ञान होता है—गुरु से । शास्त्रज्ञान से विषयज्ञान का विलय
हो जाता है । सच पूछो तो प्रत्यभिज्ञा भर का विलम्ब है; भगवान् तो मिला हुआ ही है ।
अतः शास्त्र और ईश्वर दोनों से गुरु श्रेष्ठतर है—
'भवत्प्राप्तिकामो यस्तेनान्वेष्यो गुरुर्यतः ।
भगवान् ज्ञायते शास्त्राच्छास्त्रं च ज्ञायते गुरोः ॥
तद्बोधात् ज्ञानविलयाज्ज्ञानाप्तौ प्राप्त एव स ।
तस्माच्छास्त्रादीश्वराच्च गरीयान् गुरुरुच्यते ॥'¹
पञ्चरात्र में भी कहा गया है—'यथा भगवत्येव वक्तुरि वृत्तिः' अर्थात् 'गुरु के साथ
वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा भगवान् के साथ ।'
भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य सम्यक् रूप से प्राप्त
करके इसे श्लोकबद्ध किया ।'
यह ब्रह्मविद्या का बीज है । बिना परीक्षा किए अयोग्य क्षेत्र में इसको बोना नहीं
चाहिए—'इदं च ब्रह्मविद्याबीजं नाऽपरीक्ष्याऽस्थाने वपेत् ॥'
भट्टकल्लट ने अन्यत्र भी कहा है—सिद्ध विद्या एक गुणवती कन्या के समान
है । गुणवर्जित पुरुष के प्रति उसका दान करने से वह संभोग तो देती ही नहीं, दाता को
अपकीर्ति का भी कारण बनाती है । इसलिए सद्गुणसम्पन्न को ही इस विद्या का उपदेश
देना चाहिए—
'गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणावर्जिताय ।
संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥'
इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता ।
सतां सुपर्णादिशेव शुद्धामलगुणोज्ज्वला ॥
वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु ।
शुद्ध बोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका ।
तस्मात् प्रोत्सार्य मात्सर्यमर्थमर्थं विचार्य च ।
आर्यैराश्चर्यभूताया न कार्योऽस्या अनादरः ॥
अब कारिकाकार एक, अद्वैत आत्म तत्त्व के अज्ञान का कारण मात्र संशय को
बताता हुआ कहता है कि वह महाकारण सद्गुरु के बिना उन्मूलित होना संभव नहीं है ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—(उत्पलदेवाचार्य) ।