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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 512 of 519

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Page 512

तृतीयः निष्यन्दः ४११
वह सर्वोच्च वाणी (Supreme speech) जो पश्यन्ती, मध्यमा आदि समस्त
वाणियों का केन्द्र हो । यही वाक् शिवधाम पहुँचाती है ।
(अथ च गुरुं पश्यन्त्यादि क्रोडीकारात् महतीं भारतीं परां वाच्यम्)
'वन्दे' = वह गुरुभारती जो असाधारण एवं सभी के लिए सर्वोच्च है उसमें प्रवेश
करता हूँ ।
विचित्रार्थपदां = (नानाचमत्कारप्रयोजनानि पदानि विश्रायन्तो यस्यां परस्यां वाचि
तां विचित्राणि)१
मैं उस असामान्य (लोकोत्तर) गुरुवाक् के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ या
उसमें सम्यक् रूप से प्रवेश करता हूँ जो कि सर्वोत्कृष्ट है, जो लौकोत्तर है—अद्वितीय
आनन्द स्वरूप है । या मैं—
उस वाणी का अभिकथन करता हूँ जो कि मुझे आह्लाद प्रदान करती है क्योंकि
यह सभी अवस्थाओं में स्फुरित है और जो कि व्यक्ति को अपनी सत्यता (स्वरूप) को
जानने हेतु आत्मचिंतन में निरत रहने की योग्यता प्रदान करती है ।
गुरुभारती—वह परा वाणी जो कि पश्यन्ती प्रभृति समस्त वाणियों के विभिन्न
रूपों को आलिंगित किये हुए हैं ।
वन्दे = 'स्वरूपविमर्शनिष्ठां तां समावेश्टुं संमुखीकरोमि ।' 'सर्वावस्थासु स्फुरद्रू-
पत्वात् अभिवदन्ती उद्यन्तृता प्रयत्नेन अभिवादये ।।'२
वसुगुप्तात् = आचार्य वसुगुप्त से । वसुगुप्त ने ही शिव सूत्रों को पहाड़ के
पत्थरों पर उत्कीर्ण रूप में पाया था ।
अवाप्य = प्राप्त करके ।
इदं = इस त्रिक ज्ञान को । ज्ञानघन को ।
तत्त्वार्थदर्शी—तत्त्वों के रहस्यों को जानने वाले ।
रहस्यं = अवाच्य, अगम्य एवं गूढ़ तत्त्व ।
नित्य शङ्करात्मक स्वस्वभाव समावेश को प्राप्त करने हेतु इस शास्त्र का उपदेश
किया गया है ।
आचार्य उत्पलदेव कहते हैं—हमारे गुरु की वाणी आश्चर्यकारिणी है । उसके वाच्य
और वाचक—अर्थ और पद—दोनों ही विचित्र हैं । अगाध संदेह के पयोधि में निमज्जित
होते हुए लोगों का संतरण करने वाली यह नौका है । मैं उसकी वन्दना करता हूँ ।
गुरु से श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है । जयाख्यसंहिता में कहा गया है—स्वयं
प्रकाश भगवान् जगन्नाथ ही मन्त्रमय शरीर धारण करके करुणावश अपने शास्त्ररूपी कर
कमलों से संसार—समुद्र में डूबते हुए लोगों का उद्धार करते हैं—
'यस्माद्देवो जगन्नाथः कृत्वा मन्त्रमयीं तनुम् ।
मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना ।।'
१-२. स्पन्दनिर्णय ।