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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 491 of 519

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Page 491

३९० स्पन्दकारिका
अर्थात् यह (मातृका) वस्तुतः भगवान् की क्रियात्मक स्वभाव वाली शक्ति ही है
जो कि पशुवर्तिनी बन गई है । जैसा कि कहा भी गया है—'दो सन्तानों के रूप में
चलने वाली ऐसी कोई भी जीवकला नहीं है जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री बनकर व्याप्त
न हों ॥' अतः वही क्रिया शक्ति ही अज्ञात होने की स्थिति में बन्धन का कारण बन
जाती है किन्तु वही जान ली जाने पर पुरुषों को सिद्धि प्रदान करती है ।
'जीव कला' की दो सन्तानें निम्नांकित हैं—
(क) 'ज्ञानसन्तान' (ख) 'क्रियासन्तान'
ज्ञानसन्तान—मन, बुद्धि, अहङ्कार (अन्तःकरण) ।
क्रियासन्तान—५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, प्राण शक्ति = ११ की समष्टि ।
(स्पन्द० का० ४।१८)
संसरण के कारण और पुर्यष्टक की भूमिका—
तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ।
पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थंप्रत्ययोद्भवम् ॥ ४९ ॥
भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरेदतः ।
संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥ ५० ॥
(पशुभावस्थ शिव) तन्मात्रों के स्वरूप वाले और (सूक्ष्म और उनके कार्यरूप
स्थूल) मन, अहङ्कार एवं बुद्धि—द्वारा परामृष्ट पुर्यष्टक के द्वारा बन्धनग्रस्त है । उससे ही
(पुर्यष्टक से ही) प्रत्ययोद्भव हुआ करता है । (वह) दूसरे का वशवर्ती बनकर सांसारिक
भोगों का भोग करता है और उसी की विद्यमानता के कारण संसरण करता है अतः
(उसके) संसरण के समुच्छेद के उपायों पर प्रकाश डालेंगे ॥ ४९-५० ॥
* सरोजिनी *
पुर्यष्टक के दो रूप हैं—(१) सूक्ष्म आतिवाहिक शरीर, अभिलाषात्मक एवं
तन्मात्रात्मक (२) स्थूल भौतिक भोग शरीर । सूक्ष्मशरीर से आबद्ध—अपने को उससे
घिरा हुआ—मानने वाला पुरुष । यह परवश होकर उसमें उठने वाले सुखदुःखादिक
संवेदनरूप प्रत्ययों का उपभोग करता है । वस्तुतः वह शब्दादिक के अनुभव द्वारा ही
प्रकट होता है और उतना ही उसका रूप है, मन, अहङ्कार, बुद्धि, अन्तःकरण । उसी को
अपना स्वरूप मानकर वह शरीरी हो जाता है और संसार प्राप्त करता है । मेरा कथन यह
है कि जन्ममरण एवं संसार-प्रलय के प्रवाह का यही कारण है । अपने प्रत्यय के
अतिरिक्त संसार का अन्य कारण नहीं है ।¹
पतिस्वभाव वाले आत्मतत्त्व का अपनी माया से अवभासित पशुत्व का प्रतिपादन
करके अब पशु में विद्या के आविर्भाव होने से अपने मार्ग पर स्थित हो जाने के कारण
१. उत्पलदेवाचार्य : स्पन्दप्रदीपिका ।