Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 490 of 519

Read in context
Page 490

तृतीयः निष्यन्दः ३८९
परमेश्वर का विमर्श एवं अभिलाषात्मकता का अभिन्न साहचर्य है। 'परावाक्' के
स्तर 'अ' से 'क्ष' पर्यन्त ध्वनि समुदाय का रूप ही 'अहंविमर्श' है।
क्रमहीन शिववर्तिनी क्रियाशक्ति ही सृष्टिप्रसार के समय सक्रम पशुवर्तिनी क्रिया
शक्ति के रूप में रूपान्तरित हो जाती है। अक्रमस्वरूपा शैवी क्रियाशक्ति → सक्रमा
पशुवर्तिनी क्रियाशक्ति॥
शैवी क्रिया शक्ति एवं पाशवी क्रिया शक्ति—अन्तर्सम्बन्ध—
(१) शिव की क्रिया शक्ति एवं पशुगता क्रियाशक्ति का प्राथमिक उदय इच्छाशक्ति
के स्तर पर होता है और वहाँ दोनों में क्रम नहीं होता।
(२) पशु भी वही करता है जो इच्छा के स्तर पर उदय होता है और परमेश्वर
भी वही करता है जो उसके इच्छास्तर पर उदित होता है।
(३) शिव की अक्रमा एवं सर्वकर्तृत्वशालिनी क्रियाशक्ति ही पशुओं के स्तर
पर सक्रमा एवं अल्पकर्तृत्वशालिनी क्रियाशक्ति के रूप में परिणत होती है।
(४) मानसिक संवेदन के स्तर पर उदित क्रियाशक्ति इच्छात्मक स्पन्दन के रूप में
ही होती है और वहाँ सक्रमता का नियम भी नहीं रहता।
(५) पशुस्तर पर भी क्रियाशक्ति सूक्ष्म से स्थूल की ओर बढ़ती है और उसी
प्रकार शिव स्तर पर भी यथा—निर्गुण शिव → सगुणशिव-शिव-शक्ति → सदाशिव
→ ईश्वर आदि सूक्ष्मतम से सूक्ष्म की ओर यात्रा है और—परावाक् से विकसित होते
हुए वैखरी वाक् की यात्रा = सूक्ष्म से स्थूल का विकास है।
(६) शैवीक्रियाशक्ति एवं पाशवीक्रियाशक्ति दोनों का अपना मूल स्रोत एक ही है।
(७) दोनों में भेद यह है कि एक 'कारण' है दूसरा 'कार्य', एक नित्य है दूसरा
अनित्य, एक प्रयत्नज है दूसरा सहज या स्वयंभू है, एक निरपेक्ष है दूसरा सापेक्ष, एक
उपादान सापेक्ष है दूसरा निरपेक्ष, एक स्वतन्त्र है दूसरा अस्वतन्त्र, एक सूक्ष्म है दूसरा
स्थूल, एक पाप-पुण्य से अप्रभावित है दूसरा इनसे प्रभावित, एक तृष्णामूलक है दूसरा
इच्छातीत है।
अहं विमर्श से युक्त परावाक् ही आगे चलकर 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' की भूमियों
पर आरूढ़ होती हुई वैखरी की भूमि पर स्थूल वर्ण समूह बन जाती है। शिव की
क्रियाशक्ति ही बहिर्मुखी प्रसार की ओर उन्मुख होकर पशुवर्तिनी क्रियाशक्ति के रूप में
रूपान्तरित हो जाती है। दोनों का स्वस्वरूप शिवत्व है। दोनों शिव में उत्पन्न, शिव में
स्थित एवं शिव में विश्रान्त होते हैं।
भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—'सा चेयं
क्रियास्वभावाभगवतः पशुवर्तिनी शक्तिः। यदुक्तम्—
'न सा जीवकला काचित् सन्तानद्वयवर्तिनी।
व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते॥
इति। सैव च बन्धकारणम् अज्ञाता। ज्ञाता सा च पुनः परापर सिद्धिप्रदा भवति
पुंसाम्॥' (स्पन्द का०वृत्ति) ॥