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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 402 of 519

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Page 402

द्वितीयः निष्यन्दः ३०१
वैखरीवाक् आणव उपाय से सम्बद्ध है। इस स्तर पर मन्त्र साधकों का (निम्न-
स्तरीय साधकों का) मन्त्रोच्चारण वैखरीवाक् के स्तर पर स्थूल वर्णों द्वारा स्थूल पद्धति से
किया जाता है और उच्चारित ध्वनि एवं मन्त्र व्यक्त होते हैं न कि अव्यक्त ॥
मन्त्रों का विमर्शात्मक उच्चारण इतना शक्तिसम्पन्न होता है कि साधक का
चित्त एवं परप्रकाशात्मक 'बिन्दु' ('यथा शरो धनुः संस्थो यत्नेनाताड्य धावति ।
तथा बिन्दुर्वरारोहे उच्चारेणैव धावति ।) की तीव्रता धनुष से चलाए गए शर की भाँति
होती है।
भट्टकल्लट ने जिस 'संवेदन' का उल्लेख किया है उसका स्वरूप क्या है? यहाँ
उस 'संवेदन' का उल्लेख किया गया है जिसमें कि विकल्पों को संस्कारित करने से योगी
की एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाह्योन्मुख होती हुई
संवित् तत्त्व के प्रवाह को अलंग्रास द्वारा हृदय के अन्तरतम् में संकेन्द्रित कर लिया जाता
है। इस अवस्था में मन्त्र-विमर्श के बाद तत्काल ही मन्त्रदेवता के साथ चित्त का
तादात्म्य (एकीभाव) हो जाता है। इस साक्षात्कार को संवेदनात्मक इसलिए कहा जाता
है क्योंकि देवता अपने यथार्थ स्वस्वरूप से पृथक् कोई शारीरिक सत्ता नहीं है। यह
भूमिका शाक्तोपाय के उस उच्च स्तर पर स्थित है जिसमें परमेश्वर का तीव्र शक्तिपात
होता है। ऐसे सिद्ध योगियों का आध्यात्मिक स्तर इस प्रकार का होता है—
(१) अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवाडम्बरः ।
हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ॥
(२) केतकी कुसुम सौरभे भृशं भृंग एवं रसिको न मक्षिका ।
भैरवीय परमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ॥
अर्थात् यथा ग्रीष्मर्तु में हिमसन्तति स्वयं गल जाती है उसी प्रकार योगी के लिए
संसार एक व्यर्थाडम्बर है। केतकी सुमन के परिमल का प्रेमी भौंरा ही होता है न कि
मक्षिका। इसी प्रकार भैरवीय अभेद भूमिका के प्रति किसी विरले योगी की ही उत्कण्ठा
होती है न कि सामान्य व्यक्ति की ॥ 'निर्वाण दीक्षा' में 'दीक्षा' का क्या अर्थ है?
'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया है—
दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्म वासनाः ।
दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ॥ (तं० वि०: क्षेमराज)
'दीक्षा' के अनेक प्रकार हैं यथा (१) 'हौत्री' (२) 'वैधी' (३) 'कलावती' (४)
'स्पार्शी' आदि ।
मन्त्र के देवता और चित्त का सम्बन्ध—ध्येय देवता का ध्याता साधक के चित्त
में 'उदय'—देव साक्षात्कार ध्याता योगी के चित्त में ध्येय (ध्यानालम्बन देवता) का
प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसे ही कहते हैं कि उसके चित्त में इच्छा (देव-साक्षात्कार की
इच्छा) होते ही (साधक की) देवता के साथ उसका तादात्म्य प्राप्त हो जाय ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—संवेदन के माध्यम से जो उस ध्येय (मन्त्रस्वरूप या मन्त्र-